छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीन "खानसाहब अब चाहे जो हो उस सम्भा की बोटी बोटी कर डालो और उस धोखेबाज कलुशा की मुंडी छाँटकर अलग कर दो।" गणोजी अत्यन्त उतावला हो उठा था। चोट खाया गणोजी तो विक्षिप्त-सा हो ही गया था, मुकर्रबखान के भी बहुत बुरे दिन चल रहे थे। उसकी भी शामत आ गयी थी। सवेरे सवेरे बादशाह की ओर से एक बड़ा लिफाफा आ गया था। बादशाह ने बड़े क्रोध से लिखा था, "कितनी उम्मीद से हम तुम पर नजर लगाये हुए थे ? पर जैसे अल्लाह के बन्दे से फतह किया गया पन्हाला किला हाथ से निकल गया और सलामी के समय ही तुम्हारी शिकस्त हो गयी। इससे हमें बहुत दुख पहुँचा है। कहीं ऐसा न हो कि हमें ऐसी खबर सुनने को मिले कि उस सम्भा ने तुम्हें ही अपनी गिरफ्त मे ले लिया है।" मुकर्रबखान ने दोपहर का भोजन नहीं लिया। वह आपे से बाहर हो गया था। पन्हाला की नाकामी से वह पहले ही बहुत दुखी था। वह जब भी घोड़ा दौड़ाते अपने साथियों के साथ बाहर निकलता तो उसकी क्रुद्ध आँखों को पन्हाला की पहाड़ी अवश्य दिख जाती। एक क्षण में अपनी सफलता के हाथ से सरक जाने की स्मृति उसे कुपित कर देती थी। शेख मुकर्रब के शरीर का दखिनी रक्त उसे चैन नहीं लेने दे रहा था। वह गोलकुंडा की कुतुबशाही में अपने परिश्रम से प्यादा से लेकर सेनापति तक का भार संभाला था। उसके शरीर में एक बलशाली सैनिक और कुशल योद्धा का निरन्तर वास था। वह केवल गणोजी और नागोजी जैसे जागीरदारों पर निर्भर नहीं था। उसने पहले से ही थैलियों की गाँठें खुली रखकर विपुल धन राशि को बाँटा था। मुकर्रबखान ने अपने चारों ओर सह्याद्रि के पहाड़ों, उसकी दुर्गम घाटियों और घने जंगलों में तेजी से दौड़ने वाले विश्वसनीय जासूसों को फैला रखा था। गणोजी के जासूसों से प्राप्त खबरों की वह अपने जासूसों से जाँच पड़ताल करवाता था। वह अपने विश्वसनीय जासूसों द्वारा पुष्ट की गयी सूचनाओं पर ही विश्वास करता था। एक सुबह मुकर्रबखान ने गणोजी को बुलाकर कहा, "क्यों गणोजी, सुना है कि सम्भाजी और कलश ने तुम्हारे उस संगमेश्वर में बड़े खूबसूरत महल बनवाये हैं ? सुन्दर सुन्दर बगीचे भी तैयार किये हैं। वहीं पर बगीचे के झूले पर हवा खाते ७१ सम्भाजी