छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 619, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपनी तलवारें एक ओर रख दी थीं। फावड़ा, कुदाल, बेल्चा आदि उठा लिए थे। चारों ओर भीड़ जमा हो गयी और काम की जल्दी मची हुई थी। पत्थर पर पत्थर चढ़ रहा था। गीले चूने को पीसते-पीसते बैलों की अनेक जोड़ियाँ थककर झुकती जा रही थीं। दो ही दिन में बुर्ज को खड़ा करने का कार्य अत्यन्त कठिन है। इसका ज्ञान महाराज को भी था। इसलिए बैठक समाप्त होने पर उन्होंने कवि कलश से धीरे-से पूछा, "कविराज, सच बताइये, कितने दिनों में यह कार्य पूर्ण होगा?" कवि कलश जैसे तैसे हँसते हुए बोले, "राजन! किसी उफनती नदी पर बाँध बनाना भी सम्भव हो सकता है किन्तु इस गढ़ की ढालू चट्टान पर पत्थर चढ़ाना बहुत कठिन है। दो दिन में यह कार्य पूरा करना ईश्वर के लिए भी सम्भव नहीं।" "क्यों अशुभ बोलते हो, कविराज?" राजा झल्ला उठे। "राजन! आगे सुन तो लीजिये। यदि आप स्वयं ही रात-दिन इसी तरह पहरा देते रहेंगे तो यह कठिन कार्य चार दिन और चार रातों में पूर्ण हो जाएगा।" शम्भुराजा बहुत चिन्तित दिखाई पड़ रहे थे। उन्होंने कहा, "कविराज, हमारे शत्रु को पंख लग गये हैं। महायुद्ध शुरू होने से पहले हमें अपने सेनापतियों और सरदारों को अनेक महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ देनी हैं, रणनीति निश्चित करनी है।" "उसकी चिन्ता न करें, राजन! आपके आदेशानुसार चार दिनों बाद रायगढ़ लौटते समय संगमेश्वर में जो विचार विमर्श करना है, उसकी पूरी तैयारी हो चुकी है।" "क्या हरकारे चारों ओर जा चुके हैं?" "बिल्कुल।" "यों ही सभी को अपनी अपनी चौकियाँ छोड़कर मत बुला लेना। अन्यथा हम अपनी मसलहत में मग्न रहेंगे और उधर हमारा शत्रु बाजी मार ले जाएगा।" "ऐसा नहीं होगा, राजन! आपके आदेशानुसार बिलकुल चुनिन्दा सरदारों को ही संगमेश्वर में बुलाया गया है। पाचाड़ से सेनापति म्हालोजी घोडपड़े आएँगे। इसके अतिरिक्त आपके सुझाव के अनुसार धनाजी और सन्ताजी नामक जवान लड़कों को विशेष रूप से बुलाया गया है।" "बहुत अच्छा! हमलोगों ने शिर्कों के क्षेत्र को बर्बाद कर दिया है। तब से गणोजी और उसके भाई, पूँछ जले सियार की तरह बेकाबू हो गये हैं। परसों की पन्हालगढ़ की घटना याद है न?" राजा को अच्छी सफलता और यश की प्राप्ति हो, औरंगजेब जैसे कराल काल का संकट दूर हो इस समर्थ रामदास के शिष्य रंगनाथ स्वामी भी उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आने वाले थे। उनसे संगमेश्वर में भेंट होने वाली थी। सम्भाजी :: 617