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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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जंगली किले का निर्माण किया था। सामरिक गतिविधियों की दृष्टि से इस किले का विशेष महत्त्व था। यहीं से कोंकण में उतरने के लिए, प्रभावली और देवड़ा की ओर जाने वाली जंगल की सँकरी और भयावह पगडंडियाँ थीं। यहाँ से अंबा घाट और अनुस्कुरा घाट के आवागमन पर भी अच्छी तरह नियन्त्रण रखा जा सकता था। जिस प्रकार प्रचंड आँधी के आने से घर के दरवाजे-खिड़कियाँ खुलकर जोर-जोर से टकराने लगते हैं, उसी प्रकार औरंगजेब का आखिरी आक्रमण दरवाजे पर पहुँच गया था। चाकण, शिखण, सतारा, कराड़, इस्लामपुर से कोल्हापुर तक की सारी मुस्लिम चौकियाँ, मराठों के स्वराज्य की ओर क्रुद्ध नजरों से देख रही थीं। काबुल, कन्दहार से बंगाल तक और मालवा से बुरहानपुर तक औरंगजेब का कोई शत्रु बचा नहीं था। अब औरंगजेब घमंडी और उद्दंड हो गया था। उसने दक्षिण के मित्र राज्यों में बीजापुर, गोलकुंडा को नेस्तनाबूद कर दिया था। अब उसने अपना रुख सम्भाजी और उनके पीछे खड़े सह्याद्रि की ओर किया। दक्खन की मिट्टी आहट पा चुकी थी कि महायुद्ध का अन्तिम चरण शीघ्र ही आरम्भ होने वाला है। यह भी कि इस युद्ध का अन्त औरंगजेब अथवा शम्भुराजा में से किसी एक की मृत्यु से होना निश्चित है। मुंढा दरवाजे के पास सम्भाजी राजा और कवि कलश खड़े थे। उनके साथ विशालगढ़ के अधिकारी मल्हार रंगनाथ और कृष्णाजी कोंडा भी उपस्थित थे। पहले 'खेलणा' नाम से विख्यात विशालगढ़ अब जीर्ण शीण हो चला था। मुंढा दरवाजे की पीठ से लगकर खड़ा पुराना बड़ा बुर्ज, पिछले महीने अपने आप ही ढह गया था। यदि कभी किसी की सेना बीच की लम्बोतरी खाई पार करके आ जाये तो बुर्ज के ढहने से बने गम्ते से बारूदखाने तक बड़ी आसानी से पहुँच सकती थी। वर्तमान युद्ध संकट को देखते हुए इस धोखाधायक स्थिति को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता था। इस किले का शत्रु के हाथ में जाने का सीधा अर्थ था मुगलों को दक्षिण कोंकण में घुसने का राजमार्ग प्राप्त होना। चार दिन पूर्व ही शम्भुराजा ने यहाँ की हवेली में राजगीरों और कारीगरों की बैठक बुलाई थी। उन्होंने पूछा था, "बुर्ज के निर्माण में कितना समय लगेगा?" "कम से-कम दो महीने।" उत्तर सुनते ही सम्भाजी जलती मशाल के समान भभक उठे। वे गरजकर बोले, "इस गति से होने वाला काम नहीं चलेगा। केवल दो दिन और दो रातों में यह बुर्ज बनकर खड़ा हो जाना चाहिए। राजा के आदेशानुसार अण्स्कुरा से आंबा और साखरप्पा तक हर गाँव के लिए अश्वारोही दौड़ाये गये। वे जितने मिल सके उतने मजदूर, राजगीर और थवई लेकर वापस लौटे। गढ़ की कुछ तीन हजार की सेना भी अपना फौजीपन भूल गयी। स्वराज्य के संकट का अनुमान कर उन्होंने 616 :: सम्भाजी