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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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के सम्मुख महाराज ने सिर झुकाया। दूसरी ओर मैदान में आनन्दराव, बाजी सर्जेराव, येमाजी कंक, सर्फोजी गायकवाड़, सूर्याजी मालुसरे जैसे एक से बढ़कर एक योद्धा और वीर सरदार प्रस्थान के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु शिवाजी महाराज के पाँव समाधि के पास से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। वहाँ के पवित्र वातावरण ने महाराज पर जादू सा कर दिया था। ऐसा लगा जैसे समाधि में आँखें निकल आयी थीं और जीजा माता महाराज को घूर कर देख रही थीं। पुरन्दर की घटना के बाद वाले दिन महाराज को स्मरण हो रहे थे। मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेरखान ने महाराष्ट्र को संकटग्रस्त कर दिया था। शिवाजी महाराज और संभाजी को औरंगजेब ने मिलने के लिए आगरा बुलवाया था। पिता-पुत्र के आगरा जाते समय जब शम्भुराजा ने अपने छोटे छोटे हाथों को जीजा माता के पैरों पर रखा तो मानो जीजा माता पर आसमान ही टूट पड़ा। किसी मादा पंछी की भाँति उन्होंने शम्भुराजा को अपनी बाँहों में समेट लिया और व्याकुल होकर बोलीं, "शिवबा! मेरे शम्भू बेटे को किसलिए ले जा रहे हो? अभी तो पूरी आठ बरसातें भी नहीं देखी हैं इस बच्चे ने।" "क्या करे माताजी! शर्तनामे ने हमारे हाथ बाँध रखे हैं।" किसी भी प्रकार और कुछ भी करके जीजा माता विलम्ब कर रही थीं। अपनी बाँहों से शम्भुराजा को अलग करना उनकी जान पर बन आया था। जीजा माता का वह व्यवहार शिवाजी महाराज से सहन नहीं हुआ। उन्होंने कठोर स्वर में कहा-"माताजी! कर्तव्य तो कर्तव्य ही है, छोड़ो युवराज को। यह जानकर भी कि अफजल खान से मिलने जाना मौत के मुँह में कदम रखना था, आपने कलेजे पर पत्थर रखकर कितनी निर्भयता से मुझे हँसते हँसते विदा किया था! याद है आपको?" "राजा, आप जब स्वयं दादा बनोगे तभी जान पाओगे कि पौत्र की कीमत और ममता क्या होती है?" "माताजी, आपकी पीड़ा हम समझ सकते हैं। किन्तु आप जानते हैं कि गिरगिट के बच्चे बिल में रहते हैं इसलिए जीवन भर जमीन पर रेंगते हैं। हमें तो गरुड़ के बच्चे को बड़ा करना है। उसे संकटपूर्ण मौत की खाई में नहीं फेंकेंगे तो उसके पंखों में शक्ति कहाँ से आएगी?" शिवाजी महाराज ने यह प्रश्न पूछा था। स्मृति की उस खरोंच से महाराज कुछ विचलित हो गये। उन्हें लगा कि उनसे कुछ भूल हो रही है। यह सोचकर उनका मन और दुखी होने लगा। उस काली समाधि में मानो आँखें निकल आयी थीं। लगा जैसे जीजा माता शिवाजी महाराज से पूछ रही हैं-"क्यों शिवबा, गरुड़ के बच्चे को बड़ा करने की वह भाषा अब कहाँ चली गयी? इतने शूरवीर बहादुर बच्चे को शृंगारपुर की गुफा में बन्द करके आज अकेले कहाँ जा रहे हो?" 60 संभाजी