छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके बीच रास्ता इतना संकरा है कि वहाँ पर घनी झाड़ियों और टीलों की ओट लेकर तीस-चालीस मराठे भी यदि आ जायें तो लाखों की फौज को भी श्मशान घाट दिखा सकते हैं।" "सरदार ये झूठी और पागलपन की कहानियाँ बन्द करो।" मुकर्रब चिल्लाया। "मुकर्रब आप नहीं जानते! इसी पहाड़ी प्रदेश में उंबरघाटी नाम की एक और घाटी है, वहाँ पर उस पापी शिवा ने...." मुकर्रब झट से उठकर खड़ा हो गया। वह जोर से दहाड़ा, "बस! अब इसके आगे कोई एक लफ्ज भी नहीं निकालेगा।" मुकर्रब थोड़ा पीछे हटकर एक टीले पर चढ़ गया। वहाँ से अपनी सेना को हाँक देते हुए ललकारने लगा, "मेरे दोस्तो! इस साहसिक अभियान में जीने के लिए नहीं मरने के लिए निकलना है। जिसका मुझ पर और अल्लाह पर भरोसा है वही मेरे साथ चलेगा। जिनका कलेजा भेड़-बकरी का हो वे यहीं पर डेरे में निश्चिन्त होकर ऐशोआराम करते रहें।" उसी समय मुकर्रबखान हवा के झोंके की तरह शामियाने से बाहर निकल गया। सामने खम्भे से बँधे अपने ऊँचे और बलशाली घोड़े की पीठ पर उछलकर सवार हो गया। उसके साथ ही इखलासखान और गणोजी के घोड़े भी आगे दौड़ने लगे। इस समय किसी के भी लिए रुकने को मुकर्रब तैयार नहीं था। वह एक कट्टर, तेजस्वी और दृढ़प्रतिज्ञ योद्धा था। अपनी फौज में उसने हमेशा सख्त अनुशासन रखा था। वह अपने सिपहसालारों और जानवरों को भी तरोताजा रखता था। इसलिए मुकर्रबखान के साथ उसके दो हजार घुड़सवार अँधेरे को चीरते हुए तेज गति से आगे बढ़ रहे थे। साथ में एक हजार पैदल सेना भी थी। बहुत पीछे न छूट जायें इसलिए पैदल सिपाही घोड़ों के पीछे दौड़ रहे थे। मध्यरात्रि में ही फौज बाघविल की घाटी चढ़कर ऊपर पहुँच गयी। गणोजी के मन में यह सोचकर गुदगुदी हो रही थी कि यदि सम्भाजी पकड़ में आ जाये तो आनन्द आ जाय। यह सोचकर गणोजी के मन में लड्डू फूट रहे थे। दाईं ओर ज्योतिबा का पहाड़ खड़ा था। उसी दिशा में देखते हुए गणोजी ने घोड़े पर से ही ज्योतिबा का स्मरण किया। उसने मन्नत मानते हुए कहा, "हे केदारी राय, किसी तरह उस नालायक सम्भा को पकड़वा दो। मैं एक सौ इक्यावन तोले का सोने का हार आपके गले में पहनाऊँगा।" मुकर्रबखान का नसीब अच्छा था। रास्ता दिखाने के लिए चाँदनी का हल्का प्रकाश था। उस उजाले में फौज आगे बढ़ रही थी। नावली के पास मराठी सेना का पड़ाव था। वहाँ से पन्हाला की तलहटी समीप ही थी। तीन हजार की फौज यदि 624 :: सम्भाजी