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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पास कवि कलश की विख्यात घुड़साल है। मलकापुर और आंबा घाट के बीच अभी भी कवि कलश के उच्चकोटि के सात हजार घोड़े गश्त लगाते रहते हैं। हम लोग कवि कलश को दुष्ट, बदफैली, चरित्रहीन कहकर चाहे लाखों इल्जाम लगाएँ, किन्तु गंगा के किनारे के उस ब्राह्मण ने एक बहुत ही साहसी और मजबूत फौज खड़ी कर दी है। उसने विशेष रूप से जंगली गड़ेरियों के मजबूत और फुर्तीले लड़कों को ही भरती किया है। ये लड़के शरीर से इतने मजबूत, चुस्त और फुर्तीले होते हैं कि वे बन्दरों की तरह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर सहज रूप से छलाँग लगा सकते हैं। बाढ़ के समय उफनती नदी में आसानी से तैर सकते हैं। जिन ढालू चट्टानों पर गोहें भी नहीं चढ़ पाती हैं वहाँ ये लड़के आसानी से चढ़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त खान साहब वह सम्भा हमारा दुश्मन जरूर है, लेकिन मूर्ख नहीं है।" "गणोजी! कहना क्या चाहते हो?" "खान साहब सम्भाजी को मलकापुर की इसी फौज का बहुत बड़ा विश्वास है। मान लीजिये कि हम किसी प्रकार छिपते-छिपाते इसी रास्ते से आगे बढ़ने का निश्चय करें और दुर्देव से किसी तरह मलकापुर की फौज को हमारे आने की भनक मिल जाये तो हमारी इस तीन हजार की फौज में से एक भी जीवित नहीं बचेगा जो औरंगजेब के पास जाकर सूचना दे सके।" "क्या इतने हट्टे-कट्टे रणबाँकुरे हैं, ये फौजी?" "बता तो रहा हूँ खान साहब! इस जंगल के छोकरे इतने तेज और फुर्तीले हैं कि तीन हजार की तो बात ही क्या? तीस हजार की फौज की नाक में दम कर सकते हैं। इन्हीं के भरोसे सम्भाजी पन्हाला और कोल्हापुर के सम्बन्ध में निश्चिन्त रहते हैं। मुकर्रबखान ने कुछ सोचकर गणोजी से पूछा, "तो क्या उस सम्भा को अणुस्कुरा की घाटी का पता नहीं है?" "है, उस रास्ते की भी उस मूर्ख को पूरी जानकारी है। घाटी की तलहटी में निश्चित रूप से उसका गश्ती दस्ता तैयार होगा। किन्तु उस ओर कोंकण के देसाई दलवी जैसे जागीरदार हमारे मित्र हैं। इसलिए खान साहब यही रास्ता हमें भरोसेमन्द लगता है।" "वह कैसे?" "आँखों के सामने का आंबा घाट छोड़कर, अणुस्कुरा का लम्बा रास्ता कोई क्यों चुनेगा? जानबूझकर कोई स्वयं चौबीस घंटे का प्रवास क्यों बढ़ाएगा? इतनी सीधी बात तो कोई भी सोच सकता है। इसके अतिरिक्त अणुस्कुरा घाट की ढलान भी बहुत कठिन है। वहाँ के जंगलों में दिन के समय भी उतरने में राहगीर घबराते हैं। इसलिए वहाँ से कोई फौज उतर सकती है, ऐसी कल्पना सम्भा स्वप्न में भी 626 :: सम्भाजी