छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंथा। आसन पर बैठते ही राजा का ध्यान सबसे पहले सेनापति म्हालोजी घोडपड़े की ओर आकर्षित हुआ। घोडपड़े काका (शिवाजी महाराज के समय के अनुभवी बुजुर्ग) अपनी उम्र के सत्तर वर्ष पार करने पर भी शरीर से स्वस्थ और बलिष्ठ थे। वे पूरी तरह आत्मविश्वासी दिखाई पड़ रहे थे। निश्चिन्त भाव से शम्भूराजा ने कहा, "म्हालोजी काका! आपको और आपके साथ सभी लोगों को यहाँ देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। पिछले आठ वर्षों मे निरन्तर लडता और जूझता रहा। अब बादशाह पर एक अन्तिम हमला करना है। बस एक बार जोर लगाना है।" "महाराज ! जिस प्रकार मगरमच्छों और घड़ियालों से भरी नदी में पैर रखने की हिम्मत नहीं होती उसी प्रकार यहाँ के दरों में, पहाड़ियों में, घाटियों में उतरने की हिम्मत उस औरंग्या ने नहीं की। यह आपकी बहादुरी का ही नतीजा है।" सन्ताजी, धनाजी और खंडो बल्लाल जैसे युवकों की हार्दिक इच्छा थी कि इतने दिनों बाद मिले अपने राजा से देर तक बातें करें किन्तु राजा की चढ़ी हुई आँखों और थकी हुई मुख-मुद्रा को देखकर इन युवकों ने अपनी इच्छा को भीतर ही दबा लिया। सेनापति घोडपड़े ने महाराज की ओर चिन्तित होकर देखा। उन्होंने येसूबाई से कहा, "महाराज को अब आराम करने दीजिए। कल बहुत काम है।" महाराज उठे और शयन कक्ष की ओर चल दिए। बिस्तर पर बैठकर उन्होंने येसूबाई की गोरी कलाई अपने हाथों में ले ली। उनका मन कर रहा था कि अपनी लाडली रानी से खूब बातें करें। किन्तु पिछले अनेक दिनों के निरन्तर परिश्रम और जागरण के कारण शरीर विद्रोह पर उतर आया था। बात करते समय भी उनकी आँखें मूँदी जा रही थीं। शरीर पसीने से चीकट हो गया था। स्नान करने के बाद ही सोने की इच्छा थी। किन्तु वे एक क्षण के लिए ही पलँग पर लेटे थे कि उन्हें नींद आ गयी। इतनी गहरी नींद से स्नान के लिए उठाने की इच्छा येसूबाई की नहीं हुई। उन्होंने आगे बढ़कर महाराज के गले से पन्ने की माला की रेशमी गाँठें धीरे-से खोल लीं। किमखाब का कमरबन्द भी निकाल लिया। जब उन्होंने सहज भाव से महाराज के शरीर पर हाथ फेरा तो वे चौंक गयीं। वह किसी राजा का मुलायम शरीर नहीं था बल्कि नित्य मिट्टी से जूझने वाले किसी मजदूर की खुरदुरी काया थी। महाराज के शरीर में हल्का सा ज्वर भी था। येसूबाई ने तत्काल वैद्य को बुलवाया। महाराज को थोड़ा-सा जगाया और उन्हें औषधि पिलाई। महाराज पुनः नींद के अधीन हो गये। शयनकक्ष का चिराग बुझाकर महारानी येसूबाई हल्के कदमों से बाहर की ओर गयीं। वहाँ पर म्हालोजी घोडपड़े और कवि कलश अभी भी बैठे थे। महारानी सम्भाजी :: 633