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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दूसरी ओर से अलकनन्दा नदी आकर वहाँ मिलती थी। पहाड़ी चट्टानों से कूदते- फाँदते, दौड़ते, चट्टानों से टकराकर कल-कल निनाद करते, शुभ्र और शीतल जल, संगमेश्वर के ऐश्वर्य में वृद्धि कर रहा था। इसकी विपरीत दिशा में जयगढ़ की ओर से अरब सागर की एक पतली खाड़ी संगमेश्वर से मिलती थी। ज्वार का जोश इतना जोरदार होता था कि दोनों नदियों का जल पेट में भरकर ज्वार की तूफानी लहरें गरजती हुई बढ़ती थीं। वेगवान खारा पानी नदियों के मीठे पानी को पेट में भरकर दौड़ता हुआ महादेव मन्दिर की सीढ़ियों तक पहुँच जाता था। एक ओर नावड़ी बन्दरगाह पर आज बहुत भीड़ भाड़ थी किनारे पर अनेक छोटी किश्तियाँ और छोटी बड़ी नावें दिख रही थीं। सागर से अन्दर आकर दो बड़े जलपोत लंगर डालकर खड़े थे। शरीर पर लाल कुर्ते और सिर पर फूलवाली टोपियाँ पहने मछुआरे इधर-उधर भाग दौड़ कर रहे थे। पक्की काछ बाँधे और कमर पर मछलियों से भरी टोकरियाँ लिए मछुआरिनें जल्दी जल्दी जा रही थीं। मछुआरों ने अपने लाडले राजा के लिए मछलियों से भरे टोकरे राजमहल में भेज दिये थे। वहीं किनारे पर लगभग सौ सवारों का एक दस्ता गश्ती के लिए खड़ा था। इस दल के सभी सिपाही सावधान और चौकन्ने थे। नदी के किनारे ही नावली और कस्बे के बीच राजा की प्रशस्त हवेली थी। वह हरे-भरे पेड़ों के बीच छिपी सी रहती थी। कवि कलश ने स्वयं अपनी देख रेख में इस हवेली का कार्य पूरा करवाया था। हवेली के बाहर बड़े बड़े गुलाबों से भरा एक उद्यान था। कल दोपहर से ही हवेली की गति तेज हो गयी थी। रायगढ़ से महारानी येसूबाई और कवि कलश की पत्नी तेजसबाई एक दिन पहले ही दोपहर में वहाँ पहुँच चुकी थीं। वे दोनों जल्दी ही महादेव के मन्दिर में पहुँच गयीं। उन्होंने अभिषेक की पूरी तैयारी कर ली थी। शास्त्री उपाध्याय और उनके साथ पधारे स्वामी रामदास के शिष्य रंगनाथ स्वामी की सहायता से पूजा विधि की सम्पूर्ण तैयारी की गयी थी। इस धार्मिक अनुष्ठान के कारण महाराज के राजधर्म में कोई व्यवधान उपस्थित न हो, इसका पूरा ध्यान येसूबाई रख रही थीं। कल मध्य रात्रि में जब शम्भू महाराज अपनी हवेली के सामने उतरे तो उनकी अगवानी में स्वयं महारानी येसूबाई, सेनापति म्हालोजी घोरपड़े, खंडो बल्लाल, धनाजी सन्ताजी-मानाजी आदि सभी लोग खड़े थे। सभी लोग लगभग एक महीने बाद महाराज को देख रहे थे। पिछले कुछ दिनों से निरन्तर जागरण का प्रभाव शम्भुराजा के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। उसके साथ ही कष्टसाध्य यात्रा ने उन्हें तोड़कर रख दिया था। उनकी आँखें लाल और चढ़ी हुई दिखाई पड़ रही थीं थकान से चूर-चूर हुए महाराज को लग रहा था कि सीधे जाकर अपने को बिछौने में झोंक दें। किन्तु अपनी प्रतीक्षा में सारे दिन बैठे साथियों से चार शब्द बोलना भी अनिवार्य 632 :: सम्भाजी