छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्या?'' देखते-देखते फौज ने काजली नदी पार कर ली। कुछ दूरी पर साखरपा गाँव दिखाई देने लगा। शम्भूराजा के अंग-अंग से उमड़ने वाला उत्साह देखकर कविराज का मन खिल उठा। उन्होंने कहा, "फिर भी राजन!" "रहने दीजिए कविराज! आपकी चिन्ता भी ठीक है। संगमेश्वर की पूजा- अर्चना जैसी बातें बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। औरंगजेब ने अकलूज के पास पड़ाव डाल रखा है। सह्याद्रि के हरे-भरे जंगल में अब शीघ्र ही धमाका होने वाला है। उसकी तैयारी के सम्बन्ध में अन्तिम विचार-विमर्श करने के लिए ही तो हमलोग संगमेश्वर में केवल आधे दिन के लिए मिलने वाले हैं। वहाँ भी आपके समान अनुभवी और जानकार व्यक्ति की उपस्थिति आवश्यक है। आपके कुशाग्र मस्तिष्क मे नयी कल्पनाएँ आती हैं, तो हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। "जैसी आपकी आज्ञा, राजन!" कविराज ने कहा। सात संगमेश्वर का वातावरण अत्यन्त प्रसन्न और आह्लादकारक था। किसी समय रामक्षेत्र के नाम से विख्यात यह छोटी सी नगरी हरे-भरे वृक्षों के बीच बसी हुई थी। इस नगरी के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पुराने वृक्ष खड़े थे। जगह-जगह पर नारियल, सुपारी के बाग लहलहा रहे थे। बहुत दिनों के बाद सम्भाजी राजा के महल में सवेरे से ही भीड़-भाड़ और लोगों की आवाजाही दिखाई दे रही थी। राजा के साथ लगभग दो हजार की फौज आस पास छावनी डाले थी। गत वर्ष गर्मी के मौसम में राजा के ठहरने का प्रबन्ध ऊपर कस्बे में किया गया था। उस समय इस महल की मरम्मत की जा रही थी। इसीलिए सम्भाजी ने रगोबा सरदेसाई की लकड़ी की प्रशस्त कोठी में निवास किया था। किन्तु उस समय का-सा उत्साह आज आंशिक रूप में भी दिखाई नहीं दे रहा था। युद्ध समीप था। इसलिए आगे की तैयारी और व्यूह-रचना आवश्यक थी। शम्भूराजा भी बहुत उतावली मे थे। संगमेश्वर के ऊपरी हिस्से में, कस्बे के पीछे महादेव का एक छोटा-सा मन्दिर था। वहाँ पर एक ओर शृंगारपुर की दिशा से वरुणा नदी प्रवाहित थी तो सम्भाजी 631