छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 632, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशम्भुराजा के बार-बार लाग-लपेट कर रहा था। उनके शरीर से वह बार-बार सट रहा था, अपना शरीर रगड़ रहा था। वह बेजुबान प्राणी क्या कहना चाहता है? यह शम्भुराजा की समझ में नहीं आ रहा था। वे बार-बार पाखर का मुँह प्रेम से अपने सीने से लगाते थे। अब दिन अच्छी तरह निकल आया था। कवि कलश आँखों की कोर से शम्भुराजा की ओर देख रहे थे। अपनी बात कहें या न कहें, कवि कलश इस दुविधा में थे। किन्तु अन्ततः वे धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर में बोले, "राजन! क्षमा करें। इससे पहले मैंने कभी भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया है। किन्तु........" "क्यों इस तरह बीच में रुक गये?" शम्भुराजा हड़बड़ा गये। उन्होंने कवि कलश की ओर देखा। कविराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "आज मेरी आत्मा कह रही है कि आज आप मुझे अपने साथ न ले जायें।" "क्यों? इस प्रकार बीच में ही रुक जाने का निर्णय आपने क्यों लिया?" "कविराज! महारानी संगमेश्वर आने वाली हैं। वहाँ पर महादेव का अभिषेक भी होना है। आपके जैसे धर्म-कर्म के विशेषज्ञ का साथ तो अच्छा ही रहेगा न?" "राजन! क्या आप भूल गये हैं? आपके आदेशानुसार तीन-चार महीना पहले इस कनौजिया ब्राह्मण ने अपनी चोटी में गाँठ लगाई है। हाथ में तलवार पकड़ ली है। ब्राह्मण के धर्म-कर्म को भूलकर केवल क्षात्र-धर्म धारण कर लिया है।" "फिर भी कविराज?" "नहीं महाराज! आंबा घाट की सुरक्षा का दायित्व आपने मेरे कन्धों पर दिया है। उसी को मैं पूरा करना चाहता हूँ। अच्छा-बुरा समय सूचना देकर नहीं आता। पिछले दिनों पन्हाला पर आक्रमण के समय जब अचानक आवश्यकता आ पड़ी थी, तब मलकापुर की अश्वशाला से तीन हजार घोड़े लेकर हम उस ओर दौड़ पड़े थे न? हमारी अनवधानता में वैसा ही कोई संकट आ पड़े तो क्या होगा? इसीलिए मुझे अपनी सेना के साथ यहीं रहने दीजिए।" कवि कलश की सद्भावना देखकर राजा के मन में कुतूहल जागा। उन्होंने कहा, "कविराज! आपकी तत्परता और निष्ठा का ज्ञान मुझे है, किन्तु वैसी कोई बात इस समय है नहीं। आंबा घाट तो पूरी तरह सुरक्षित है। उस पार अणुस्कुरा घाटी उतरने पर, गोवा के रास्ते में, राजापुर के पास हमारी पाँच हजार की सेना निरन्तर गश्त लगा रही है। दूसरी ओर मालेघाट, तिवरा, आंबा आदि सभी पहाड़ियों पर अपनी चौकियों के पहरे हैं। इतना ही नहीं, जयदुर्ग, दंडराजपुरी, हरिहरेश्वर जैसे समुद्र के तटीय प्रदेशों पर भी सुरक्षा की अच्छी व्यवस्था है। यहाँ के किलों के सम्बन्ध में तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यहाँ जंगलों, दर्रों, घाटियों में तो हमारे भय से गरूड़ भी नीचे उतरने में खौफ खाते हैं। फिर चील, गिद्धों की तो बिसात ही 630 :: सम्भाजी