छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिनों तो हमारी येसू के मतानुसार जहाँ कहीं दो नदियाँ आपस में मिलती हैं, वहीं पर हमारा भाग्य नया मोड़ लेता है। अब औरंगजेब के साथ हमारी अन्तिम लड़ाई शीघ्र ही आरम्भ होने वाली है। ऐसे समय में संगम के महादेव की महापूजा सम्पन्न की जाय, ऐसी उनकी हार्दिक इच्छा है। इसके अतिरिक्त हमारे विशिष्ट साथियों के साथ विचार विमर्श भी वहाँ होना है। यह कारण भी उनके लिए महत्त्वपूर्ण है। "किन्तु किसी संगम पर आपके जीवन में मोड़ आता है। यह आप कैसे कह सकते हैं?" "देखिए न! कृष्णा और वेष्णा का माहुली के पास संगम है। उस समय हमारे शरीर में यौवन का उफान था। उल्टा मुल्टा दुस्साहस दिखाकर, मुगलों के पेट में घुसकर, उनकी पालकी का फुँदना हमें उड़ा ले जाना था। हम कुछ दुर्लभ करिश्मा करके अपने पिताजी को प्रसन्न करना चाहते थे। इसी उन्मादी जोश में हम माहुली संगम पर दिलेरखान से जा मिले। किन्तु मेरे साथ जो धोखा हुआ उसका बोध हमें बहादुरगढ़ के पास हुआ। बहादुरगढ़ भी भीमा और सरस्वती नदियों का संगम है।" कविराज भावविभोर सम्भाजी को देखते रह गये। शम्भूराजा ने आगे कहा, "संगमेश्वर, अर्थात् अलकनन्दा और वरुणा नदियों का दूसरा संगम। हमारी महारानी की इच्छा है कि वहाँ पर हम महादेव का दूध-दही से अभिषेक करें। उससे हमारे जीवन में कुछ तो महत्त्वपूर्ण घटित होगा, कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आएगा, अलाएँ बलाएँ टल जाएँगी।" येसूबाई की इस पवित्र भावना की कवि कलश ने मुस्कराकर दाद दी। इसी समय शम्भूराजा फिर बोल पड़े, "सच कहूँ, कविराज ! अब इस अन्ध श्रद्धा, पूजा- पाठ और अनुष्ठानों पर मेरा तनिक भी विश्वास नहीं है। किन्तु जब मनुष्य ही दानव की तरह व्यवहार करने लगे और मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ जाता है तो हारे हुए मनुष्य का मन झुँझलाकर कोई अवलम्ब खोजने लगता है।" कवि कलश किसी प्रकार मुस्कराये और बोले, "राजन! सच कहूँ, आपके निकट साहचर्य में इतने दिन रहने के बाद आपके विषय में कुछ दृष्टिकोण बन गया है। आपको अपने ही सगे सम्बन्धियों ने अपनी दुष्टता से बहुत-सी बाधाएँ और कठिनाइयाँ पहुँचाई हैं। ऐसे लोगों के सामने तो श्मशान के भूत भी पीछे रह जाएँगे।" सम्भाजी की आधी फौज पहाड़ी उतरकर नीचे पहुँच चुकी थी। उस फिसलनभरी ढलान पर से घोड़े पर चढ़कर नीचे उतरना सम्भव नहीं था इसलिए घोड़े सैनिकों के साथ कोतल चल रहे थे। शम्भूराजा का लाडला घोड़ा पाखर सम्भाजी :: 629