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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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मुँह अँधेरे में जैसे ही बुर्ज का निर्माण कार्य समाप्त हुआ, मजदूरों और सैनिकों में जोश उमड़ पड़ा। माँ भवानी और शिवाजी, और शम्भुराजा की जयकार से विशालगढ़ की घाटियाँ गूँजने लगीं। शम्भुराजा और कविराज की आँखों में भी रातभर नींद नहीं आयी थी। ठहरने का समय नहीं था। राजा की आँखों से तो आज कल रोज नींद गायब रहती थी। बहुत सबेरे ही शम्भुराजा, मल्हार रंगनाथ और कृष्णाजी कोंडा साथ साथ गढ़ की मस्जिद में पहुँचे। इस घने जंगल में तीन सौ वर्ष पूर्व मलिक उत्तुजार को उसके सात हजार सैनिकों के साथ कंठस्नान कराया गया था। बहमनी साम्राज्य के सेनापति उत्तुजार की खौफनाक चीख किसी ने भी नहीं सुनी थी। लावारिस मलिक का कोई भी लगा सगा नहीं बचा था। किन्तु उसकी मृत्यु के बाद इन्हीं घाटियों और दर्रों के लोग दौड़कर आगे आये। जो पत्थर मलिक के खून से रंग गया था उसे लोग श्रद्धापूर्वक उठाकर ले आये। उसी पर एक मस्जिद खड़ी कर दी। मलिक को लोग पीरबाबा कहकर स्मरण करने लगे। उसके दर्शन को हिन्दू मुसलमान दोनों विशालगढ़ आने लगे। उसके लिए मुर्गियों का ढेर लगने लगा। हर साल उसका उर्स सजने लगा, वह दीन दुखियों की मन्नतें पूरी करने लगा। पुत्र प्राप्त करना हो, घर में खुशहाली ले आनी हो, चरवाहों को अपने जानवरों की रक्षा करनी हो आदि की जिम्मेदारी उस क्षेत्र में पीरबाबा की ही थी। शम्भुराजा ने श्रद्धापूर्वक पीरबाबा की पूजा की। वे गढ़ के पीछे काल दरवाजे से पिछले प्रचंड दर्रे से पहाड़ी उतरने लगे। उनके साथ उनका लाडला अश्व पाखरू भी चल रहा था। कविराज भी साथ थे। बेर करौंदे की घनी झाड़ियों के कठिन रास्ते से लगभग एक हजार की सेना कोंकण की ओर तेज गति से बढ़ रही थी। रास्ते में स्थान स्थान पर कमर तक ऊँची घास थी। घास की नुकीली किरणें शम्भुराजा के लम्बे अँगरखे में चुभ रही थीं। पौ फटने लगी थी। अँधेरे की दह में डूबी पहाड़ी अपनी गर्दन बाहर निकालने लगी थी। ढाल पर उतरते उतरते कवि कलश ने कहा, "राजन! हमने सुना है कि येसू भाभी भी रायगढ़ से संगमेश्वर की ओर निकल पड़ी हैं।" शम्भू महाराज दिलेरी से हँसते हुए बोले, "जाने भी दो कविराज! आखिर वे हैं तो स्त्री ही। कुछ अवसरों पर वे अस्तित्व से मैदान मार ले जाती हैं। यहाँ की पहाड़ी को उठाकर वहाँ रख देती हैं। किन्तु यदि पति को हल्का सा ज्वर भी हो जाये तो एकदम छुई-मुई बन जाती हैं।" "समझा नहीं राजन?" "जो हमारे ध्यान में भी नहीं होता वही उनके मन में निवास करता है। इन 628 :: सम्भाजी