छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे बलिष्ठ बूढ़ों के जीवित रहते आप तनिक भी दुखी न हों। महाराज! आप ही हमारे राज्य के सच्चे रक्षक हैं। सभी के ऊपर आकाश की तरह छाया करने वाले बड़े महाराज, हमें छोड़कर अचानक परलोक सिधार गये। तब इस राज्य का भार आप जैसे बाइस-तेइस वर्ष के तरुण पर आ पड़ा। बुजुर्ग मंडली को धैर्य से काम लेकर आपका मार्ग-दर्शन करना चाहिए था। किन्तु अनेक बुजुर्ग वह परिपक्वता नहीं दिखा सके। अनेकों ने राजद्रोह जैसे भयंकर अपराध भी किये। ऐसे भयानक अपराधियों को शिवाजी महाराज ने कभी भी माफ नहीं किया होता। इन अपराधियों के पुराने सम्बन्धों और कार्यों का ध्यान करके आपने उन्हें पुनः उन्हीं पदों पर बहाल कर दिया। आपने उन्हें रोजी-रोटी दी और उन्होंने आपके भोजन में जहर मिलाने का काम किया। महाराज! एक बार दरवाजे पर खड़े शेर या बाघ से भी लड़ा जा सकता है फिर चाहे जीत हो या हार। किन्तु घर के भीतर फैले चूहों की व्यवस्था बहुत कठिन होती है। महाराज! नितान्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आप किस प्रकार जूझते रहे, लड़ते रहे? यह इस बूढ़े ने बहुत निकट से देखा है। इसलिए मैं अपने प्राण और अपनी तलवार आपके कदमों में समर्पित करता हूँ।'' अपने पैरों के पास म्हालोजी द्वारा रखी गयी तलवार को शम्भु महाराज ने ध्यान से देखा और झुके हुए म्हालोजी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनका आभार मानते हुए शम्भूराजा ने कहा, “घोडपड़े काका! आप स्वराज्य के पराक्रमी सेनापति हैं। इसलिए कल जहाँ भी आवश्यकता पड़े वहाँ तत्काल दौड़ पड़ने के लिए मैंने आपकी नियुक्ति पाचाड़ के दुर्ग पर की है। मुझे पूरा विश्वास है कि रायगढ़ आपके संरक्षण में पूर्णतया सुरक्षित रहेगा।'' “अवश्य! अवश्य, महाराज। स्वराज्य की रक्षा के लिए यह म्हालोजी अपनी जान की बाजी लगा देगा। '' बोलते-बोलते घोडपड़े का गला रुँध गया। वे अभिभूत होकर बोले, “वैसे भी महाराज जिसे भी मराठी राज्य का सेनापति होना है, उसे अन्ततः रक्षा करते-करते मृत्यु को गले लगाना ही होगा। अभी तक तो इस धरती का यही नियम रहा है। नेमरी के जंगल में बहलोलखान से लड़ते हुए प्रतापराव जलकर खाक हो गये। उनके बाद उन्हीं की रक्तरंजित तलवार उठाकर हंबीरराव ने सेनापति पद सँभाला। वाई के युद्ध में उन्होंने सर्जाखान के साथ कड़ा मुकाबला किया। ‘शम्भु महाराज की जय' की गर्जना करते हुए हंबीरराव ने अपने प्राणों का अर्पण कर दिया। महाराज! अब वही तलवार आपने बड़े विश्वास के साथ मुझे सौंपी है। भगवान जाने, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है?” भविष्य में आने वाले संकटों के सम्बन्ध में विचार-विमर्श हो रहा था। खंडो बल्लाल और येसूबाई, रायगढ़ और अन्य पहाड़ी किलों पर रखे गये द्रव्य और गोला-बारूद की जानकारी दे रहे थे। अन्तिम लड़ाई को जीतने के लिए किस प्रकार 638 :: सम्भाजी