छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंध्यान अगला शब्द सुनने के लिए आकर्षित हुआ। महारानी येसूबाई भी सँभलकर बैठ गयीं। भावविभोर होकर शम्भू महाराज ने कहा, "हमारा पहला अस्त्र है, हमारे शिवप्रभु अर्थात हमारे पूज्य पिता का पुण्य और दूसरा अस्त्र है सह्याद्रि की पर्वत श्रेणियों में बने हमारे पहाड़ जैसे मजबूत दुर्ग। मान लीजिए कि वह उनसे बच जाता है या सँभल जाता है और सह्याद्रि की घाटियों और दरों में घुसने की उसे दुर्बुद्धि आ जाती है तो यहाँ के पाषाणी दुर्ग, ढालू चट्टानें उसे दौड़ा-दौड़ा कर भगाएँगी।" बैठक में जमा लोगों पर एक आदेशात्मक और तेज नजर डालते हुए शम्भू महाराज बोले, "मित्रो! साधन-सामग्री की दृष्टि से यह औरंगजेब सचमुच आलमगीर है। यद्यपि वह पिछले अनेक वर्षों से दक्षिण में लड़ाइयाँ लड़ रहा है तथापि उसका साम्राज्य विस्तार बहुत बड़ा है। काबुल-कन्दहार से लेकर बंगाल आसाम तक और दक्षिण में मालवा तक उसका साम्राज्य फैला हुआ है। वहाँ से वह करोड़ों रुपये की लगान वसूल करता है। उसकी तुलना में अपना स्वराज्य एकदम छोटा सा है। बादशाह द्वारा शासित लगभग अठारह प्रदेशों में से एकाध किसी आधे सूबे जितना, बस! आमदनी भी उसी अनुपात में कम। बड़े महाराज की जमापूँजी या उनका खजाना मैंने कहीं भी फिजूलखर्ची में बर्बाद नहीं किया। बल्कि उस खजाने को बड़ी सूझ बूझ से मैं उपयोग में लाया हूँ। इसीलिए आठ-नौ वर्षों तक हमने दुश्मन के फौजी महासागर का मुकाबला किया है। दुर्भाग्य से पिछले तीन वर्षों के अकाल ने राज्य की कमर तोड़कर रख दी है। फिर भी मेरे रणबाँकुरो, जिस साहस और संकल्प के साथ आप जूझ रहे हैं, उसका कोई भी जोड़ नहीं है। अपने महाराष्ट्र के अतिरिक्त, अन्य कोई भी प्रदेश ने उस पागल बादशाह को कभी भी इस तरह परेशान नहीं किया।" शम्भुराजा की आँखें नम हो गयीं। अपने जरीदार रेशमी दुशाले से आँखें पोंछते हुए वे बोले, "आज मैंने इस आपातकालीन विचार विमर्श की बैठक के लिए आपको यहाँ बुलाया है। इसमें म्हालोजी और सूर्याजी जैसे वरिष्ठ लोग भी हैं और जिनकी मसें अभी अभी भीगी हैं ऐसे धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल जैसे तरुण भी हैं। म्हालोजी काका, कविराज और महारानी जी हम आपसे शपथपूर्वक कह सकते हैं कि धनाजी सन्ताजी जैसे हट्टे कट्टे मजबूत जवान ही कल हमारे स्वराज्य की बागडोर सँभालने वाले हैं। मित्रोऽऽ, आज तक आप सबने यहाँ की धरती और इस राजा के प्रति जो निष्ठा दिखाई है, उसके लिए हम आपका लाख-लाख आभार मानते हैं।" शम्भुराजा का स्वर कातर हो गया था। म्हालोजी घोडपड़े अपनी जगह पर उठकर खड़े हो गये। वे भी भावुक हो गये थे। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज ! हम सम्भाजी :: 637