भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 643

हो गये और महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। महाराज ने कहा, "धनाजी, रत्नागिरि की चौकी पर आपको पैर गड़ाकर खड़ा रहना होगा। औरंगजेब की सहायता से फिरंगियों का आक्रमण उस ओर से होने की आशंका है। हमारे सगे रिश्तेदार, सावन्तवाड़ी वाले महादजी खेगमावन्त के साथ औरंगजेब से मिल गये हैं। गोवा और सावन्तवाड़ी की सेनाएँ एक साथ मिलकर युद्ध में उतर सकती हैं।" शम्भुराजा ने एक बार पुनः धनाजी की ओर देखा। तब धनाजी मुस्कराकर बोले, "महाराज ! कनखजूरे के चाहे कितने ही पैर हो जायें, यदि एक बार उसकी कमर कुचल दी जाये तो वह समाप्त हो जाता है। आपने मुझ पर जो दायित्व सौंपा है उसे हम निश्चित रूप से पूरा करेंगे।" महाराज ने सन्ताजी घोडपड़े को अपने पास बुला लिया। नक्शे पर हरिहरेश्वर, दंडाराजपुरी, चौल से पनवेल तक का प्रदेश और पश्चिमी किनारे के सारे बन्दरगाह और खाड़ियाँ उन्हें दिखाई। फिर महाराज ने ललकारते हुए कहा, "संतोबा, आप पर हमारा अटूट विश्वास है। अभी-अभी आप जिंजी तक दौड़ लगाकर लौटे हैं। जंजीरा के मगरमच्छों की दुबारा याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। सिद्दी बहुत बड़ा लुच्चा है। वह ऐन मौके पर धोखा करेगा। इसलिए आप हरिहरेश्वर से पनवेल तक निरन्तर दौड़ लगाते रहें।" सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। वे अपने तरुण पुत्र को आनन्दविभोर होकर देख रहे थे। सन्ताजी ने येसूबाई, अपने पिता म्हालोजी और खंडो बल्लाल की ओर दृष्टिपात करते हुए शम्भू महाराज से कहा, "महाराज ! सागर के इस किनारे की ओर से तो आप निश्चिन्त हो जाइये। आपने मुझ जैसे नवयुवक पर विश्वास करके यह दायित्व सौंपा है। मैं स्वयं को धन्य अनुभव कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि दंडाराजपुरी के जंगलों में घोड़ा कुदाते हुए मुझे कोंडाजी बाबा की आत्मा मिलेगी। जहाँ कहीं भी हम भटकेंगे, कोंडाजी बाबा हमारा मार्ग-दर्शन करेंगे। इतना अवश्य कहूँगा, महाराज ! कि आज इस सभा में बैठे खंडो बल्लालजी से मुझे ईर्ष्या हो रही है।" सन्ताजी की बात को सुनकर सभी लोग उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगे। सन्ताजी ने ही कहना आरम्भ किया, "महाराज खंडो बल्लाल भी मेरी ही उम्र के हैं। गोवा की लड़ाई जब सागर की तूफानी लहरें बहाये लिये जा रही थीं तब इन्हीं खंडोबा ने पानी में छलाँग लगाकर आपके प्राणों की रक्षा की थी! यदि कल यहाँ आग का दरिया बहने लग जाये और उस उमड़ती आग में कूदकर मैं आपकी थोड़ी-सी भी सहायता कर सकूँ तो अपना जन्म सार्थक मानूँगा।" धनाजी और सन्ताजी के उद्गारों से विचार-विमर्श के लिए बैठे सभी लोगों में उत्साह आ गया। सम्भाजा [641]