छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 654, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंन्याय देना था। इन सभी कार्यों को निपटाकर नाश्ते से पहले संगमेश्वर छोड़ देने का शम्भूराजा ने निश्चय किया था। येसूबाई तत्काल निकलने का आग्रह कर रही थीं। तब म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "बहूरानी इतनी जल्दी क्यों मचा रही हैं। कल सवेरे सब लोग निकलेंगे।" "ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु, " "बेटी सुनो! रात को घाट से यात्रा करते समय कुछ मालूम नहीं पड़ता। आकाश की छिटकी चाँदनी मामूली चिराग की तरह रोशनी देती है। पैरों के नीचे की जमीन भी किसी प्रकार का धोखा नहीं देती।" "परन्तु यहाँ किस बात का भय है?" "यह कोंकण की बस्ती है। यहाँ पेड़ों की घनी छाया के कारण चाँदनी भी जमीन तक नहीं पहुँच पाती। इसके यहाँ मणियार, फेटार कराइत जैसे विषधर पाए जाते हैं। तुम शृंगारपुर में पली-बढ़ी हो। तुम्हें यह सब बताने की आवश्यकता है क्या?" अनेक आग्रह थे। किन्तु येसूबाई ने संगमेश्वर के सूबेदार को आदेश दिया था कि चाहे जो भी हो एकदम सुबह निकलना है। उन्होंने यह भी कहा था कि पालकी और ढोने वाले मजबूत कहारों को तैयार रखे। किन्तु रात को मोने के पहले सूबेदार मोरे दौड़ते हुए आये। उन्होंने सूचना दी कि औंध से अर्जोजी और गिरोजी यादव यहाँ पहुँच गये हैं। राजा ने तीन दिन पहले उन्हें विशालगढ़ पर संगमेश्वर में मिलने का समय दिया था। अर्जोजी एक विश्वासपात्र आदमी थे। दुर्गाबाई और राणू दीदी को बहादुरगढ़ में मिलने के लिए उन्होंने छद्मरूप से प्रवेश किया था। शम्भूराजा के सामने संकट था कि यादव बन्धुओं की बात कल सुबह सुनें या आगे का समय दें। किन्तु यह बात भी सच थी कि यादव बन्धु पिछले कई वर्षों से त्रस्त थे। सूबेदार ने धीरे से कहा, "महाराज और भी दो तीन प्रार्थना पत्र हैं।" "ठीक है, सबकी फरियाद सुनेंगे। परन्तु इन सभी को सूर्योदय से पहले यहाँ आने को कहिए। नाश्ते से पहले सभी मामलों को समाप्त करना होगा। वहाँ रायगढ पर कामों का अम्बार लगा है।" शम्भूराजा ने कहा। येसूबाई को इन मामलों में समय गँवाना उचित नहीं लग रहा था। आधी रात देखा हुआ वह भयानक स्वप्न येसूबाई के रक्त के प्रत्येक कण में व्याप रहा था। उन्हें लग रहा था कि जितनी जल्दी यहाँ से निकल जायें उतना ही अच्छा। प्रातःकाल महाराज उठ गये। उन्होंने स्नान करके पूजा की। येसूबाई ने भी स्नान करके पूजा की। इसी बीच सूबेदार ने आकर कहा, "महाराज! बाहर पालकी आदि सब तैयार है।" येसूबाई की चिन्ताग्रस्त मुखमुद्रा को देखकर शम्भूराजा ने कहा, "महारानी आप इतनी चिन्तित क्यों हैं? आप आगे निकलिए हम भी पीछे-पीछे घोड़ा भगाते 652 . सम्भाजी