छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही पानी में उठी उस आवाज से घर के बाहर बँधे घोड़े हिनहिनाए थे और फिर शान्त हो गये थे। थके-हारे शम्भू महाराज बिस्तर पर लकड़ी की तरह बेसुध पड़े थे। येसूबाई को पसीना छूट रहा था। मुँह से शब्द निकल नहीं रहे थे। इतना भयानक स्वप्न उन्होंने जिन्दगी में कभी नहीं देखा था। वे अपने मस्तिष्क में स्वप्न की टूटी कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही थीं। दिमाग पर बहुत दबाव डालने पर वह दुःस्वप्न उनकी मन की आँखों के आगे फिर से घूम गया। ऐसी दानवी भैयादूज संसार की किसी बहन ने भी कभी स्वप्न में भी नहीं सोची होगी। येसूबाई पसीने से भीग रही थीं। सपने में उन्होंने देखा कि वे भैयादूज के लिए सुन्दर रंगोली सजाकर भाई के लिए चन्दन की चौकी रखी। पूजा की थाली और उपहार की वस्तुएँ तैयार कीं। किन्तु चौकी पर भाई की जगह उन्हें कोयले का ढेर दिखाई पड़ा। ऐसे कोयले जिन्हें अभी-अभी धधकती आग से निकालकर बुझाया गया हो। आरती की सोने की थाली के समीप दिखने वाला हाथ परिचित था। उस कलाई पर सर्पाकार सुवर्ण कंगन निश्चय ही गणोजी का था। सपने में भी आरती उतारने के बाद येसूबाई ने अपना सिर गणोजी के पैरों में रख दिया था। परन्तु अपने भाई से मिले भयानक उपहार से वे थरथर काँप रही थीं। भय से कलेजा मुँह को आ रहा था। पूजा की थाली में वह उपहार! वह रेशम जैसे लम्बे-लम्बे केश कलाप, ताजे खून से चिपकी दाढ़ी, किसी शिल्पाकृति की भाँति अधखुली गहरी आँखें और थाली में गिरा वह खून। यह सिर तो शम्भू महाराज का है। येसूबाई जोर से चिल्लाने को हुई। परन्तु समीप ही गहरी नींद में सोये सम्भाजी पर उनकी दृष्टि पड़ी। ऐसा लगा जैसे किसी लम्बी यात्रा से लौटा चन्द्रपुर का कोई राजकुमार मेघों की दुलाई ओढ़े शान्तिपूर्वक सोया हो। शम्भूराजा की मुद्रा जितनी थकी हुई थी उतनी ही पवित्र लग रही थी। येसूबाई का दम घुट रहा था। महल के अलिन्दों से आने वाली तेज हवा पेड़ों से गिरने वाले पत्तों को ही नहीं पूरे ब्रह्माण्ड को भयभीत कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने इस संगमेश्वर के वन प्रदेश को अपने वश में कर लिया हो। यहाँ अधिक समय तक रुकना नहीं है ऐसा आग्रह उन्होंने पिछली रात ही शम्भू महाराज से किया था। रात की मन्त्रणा पूरी होने के बाद शम्भूराजा ने अपने सहकारियों से कहा, "जिनके लिए सम्भव हो वे इसी समय निकल जायें। जिसके लिए जो जगह निश्चित की गयी है, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायें। उसी समय सेना की कुछ टुकड़ियाँ सगमेश्वर से निकल पड़ीं। किन्तु शम्भूराजा के पैर थम गये। उन्होंने अर्जोजी यादव के निवेदन को सुनने का वचन दिया था। दूसरे कुछ अन्य गरीबों को सम्भाजी :: 651