छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 652, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे कहा, "गणोजी आप घबराइये नहीं। हम आपको अगुआइ करने के लिए नहीं कहेंगे। आपको फौज के पीछे रखेंगे। किन्तु किसी भी स्थिति में आपको साथ तो चलना ही है।" "परन्तु सरकार आपके साथ रसद, राह दिखाने वाले सब कुछ दे देता हूँ किन्तु मुझे वापस जाने की इजाजत दीजिए।" गणोजी ने दोनों हाथ जोड़कर घबराये हुए स्वर में कहा। पहले ही देर हो चुकी थी। फौज बीच में रुकी थी। गणोजी ऐन मौके पर हिम्मत हार रहा था। यह देखकर मुकर्रब लाल-पीला होने लगा। घोड़े पर से ही अपने मजबूत दाहिने हाथ से गणोजी के गले की पट्टी पकड़कर खींचा और कहा, "शिर्के, तुम क्या मुझे मूर्ख समझते हो? तुम्हारे बाप दादों ने कुछ शताब्दी पहले इन्हीं जंगल-घाटियों में सात हजार की फौज के साथ मलिक उत्तुजार बन्दे को धोखे से मार दिया था। वैसी स्थिति आयी तो मैं भी डूब मरूँगा लेकिन तुम्हें साथ लेकर। चलो, बचपना छोड़ो।" छिटकी चाँदनी में फौज की दौड़ पुनः आरम्भ हो गयी। घोड़े सरपट भाग रहे थे। रास्ते की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ और खाइयाँ पीछे छूटती जा रही थीं। भोर के समय संगमेश्वर से निकलकर आ रहे कुछ पथिक मिले। उनसे खबर मिली कि कल दिन भर सम्भाजी राजा संगमेश्वर में ही थे। किन्तु आने वाली सुबह को रायगढ़ की ओर निकलने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही मुकर्रब के घोड़ों को मानो पंख उग आये। मुकर्रब, इखलास और गणोजी साथ तीन हजार की फौज तेजी से भागते हुए कँटीले रास्ते को पार करने लगी। संगमेश्वर के संगम पर जीवन-मृत्यु की आर-पार की लड़ाई ही अब उनका एकमात्र लक्ष्य था। दो पानी में छपाक से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी। येसूबाई की आँख एकाएक खुल गयी। वे बिस्तर पर उठ बैठीं। उन्होंने अनुमान लगाया कि पीछे की नदी में कोई पेड़ की डाली गिरी होगी। येसूबाई अचकचाकर इधर-उधर देखने लगीं। महल के पर्दे हल्की हवा से सरसरा रहे थे। पर्दों के साथ बँधे घुँघरुओं की भी आवाज आ रही थी। चिरागदान का तेल समाप्त होने को आया था। थोड़ी देर पहले 650 :: सम्भाजी