छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसभी प्रसन्न हो रहे थे। प्यारे गणोजी ने खाने पीने की कोई कमी नहीं होने दी थी। अब केवल आगे-आगे बढ़ना था। यदि शम्भू महाराज संगमेश्वर छोड़कर चले गये तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। अपने हिस्से में अपयश आने का भी भय था। यदि शम्भू न मिले और अपयश का भागी होना पड़ा तो इस रास्ते से पीछे आकर सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचना बहुत कठिन था। यह तो सीधे मृत्यु के सामने खड़ा होना था। मुकर्रब जिस हट्टे-कट्टे घोड़े पर सवार था उसे कभी हाथों से थपकियाँ दे रहा था तो कभी चमड़े के पट्टे से मारकर नचा रहा था। उसे सामने जंगल की गड्ढेदार पगडंडी की कोई चिन्ता न थी। वह इस तरह भाग रहा था मानो शिकार उसके हाथ में आ गया हो। सैनिक और जानवर सभी उत्साहित हो गये थे। आधी रात हो गयी। मुगल सेना के साथ उस वन-प्रान्तर में चारों ओर चाँदनी छा गयी। उनकी थकान दूर करने के लिए ठंडी हवा बहने लगी। ऐसा लगा मानो गणोजी दादा के साथ प्रकृति भी दुश्मनों के साथ हो गयी थी। मुकर्रब पूरी तरह एकाग्र हो गया था। उसकी आँखें जग रही थीं। उसके घोड़े के आगे गणोजी के रास्ता दिखाने वाले दस-पन्द्रह घोड़े दौड़ रहे थे। उन्हीं की सहायता से मुकर्रब और तीन हजार की फौज पूँछ की तरह पीछे-पीछे भाग रही थी। मुकर्रब को लगा कि कोई उसे पुकार रहा है। उसने उसी क्षण घोड़े को रोक दिया। उसका जवान बेटा इखलास 'अब्बाजानऽऽ, अब्बाजानऽऽ' कहते हुए उसके पास आ गया। अपने पिताजी के घोड़े के बहुत समीप आकर इखलास ने मुकर्रब के कानों में कुछ कहा। घोड़े अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गये। फौज के पीछे पीछे चलने वाले गणोजी को आगे बुलाया गया। गणोजी मुकर्रबखान के पास आये। उनका उतरा हुआ चेहरा रात की चाँदनी में भी स्पष्ट दिख रहा था। गणोजी को देखते ही मुकर्रब ने उन्हें फटकारते हुए कहा, "क्यों गणोजी! क्या बात है?" "सरकार! मैं आपको बाघ की खोह तक ले आया हूँ। मेरे रहबर, मेरी रसद सब आपकी सेवा में हैं। पर सरकार मुझ पर रहम कीजिए। मुझे यहाँ से पीछे जाने की इजाजत दीजिए।" "आप पागल तो नहीं हो गये?" गणोजी का गला भर आया। आवाज भरभरा गयी। वे बड़ी कठिनाई से बोले, "खानसाहब! आपसे क्या कहूँ? इन पहाड़ियों के भोले और पागल लोग उस शिवाजी और सम्भाजी को भगवान मानते हैं। कल यदि सम्भा हाथ से निकल गया तो वह आग का खेल खेलेगा। हमारी जड़-शाखा कुछ भी उपचार के लिए नहीं बच पाएगी।" मुकर्रबखान और इखलास ने आपस में बात की। उसके बाद मुकर्रब ने शिर्के सम्भाजी :: 649