छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीपल के नीचे खड़े गाँव वाले बड़े कुतूहल से देख रहे थे। कल हवा के पैरों से भागने वाले कुछ हरकारों और कुछ मार्ग दिखाने वालों को गणोजी ने आगे भेजा था। गणोजी ने सन्देश भेजा था कि मुगलों की सेना का एक हिस्सा मराठों के साथ मिल गया है। वह दल सम्भाजी राजा से मिलने के लिए इसी रास्ते से आने वाला है। आसपास की बस्तियों में भोर से ही रोटी-नाश्ते की व्यवस्था कर ली गयी थी। गाँव वाले रोटी-चटनी लेकर इसी सेना की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़े विश्राम के बाद लोग रोटी-चटनी और जानवर हरी नरम घास पर टूट पड़े। वहाँ बहुत समय रुकना खतरे से खाली नहीं था। मुकर्रबखान और गणोजी ने जल्दी मचाई। सभी तरोताजा होकर दलान के सामने का रास्ता नापने लगे। सामने का रास्ता चट्टान की ढलान की तरह नहीं था। फिर भी ठीक तरह से दिखाई नहीं पड़ रहा था। ऊबड़-खाबड़ गड्ढों पोरसाभर ऊँचे-ऊँचे पत्थरों और कँटीली झाड़ियों से होकर रास्ता आगे सरक रहा था। मुकर्रब के साथियों से जब न रहा गया तो उन्होंने खान के सामने ही गणोजी की शिकायत की, "यह शैतान गणोजी हमें कहाँ लिए जा रहा है ? उस ओर गोवा की ओर से आने वाली घोड़ों के लिए सुगम राह को क्यों छोड़ रहा है ?" इस शिकायत पर गणोजी हँस पड़े। मुकर्रब के सैनिकों से उन्होंने कहा, "वह गोवा की ओर से आने वाला रास्ता सीधे आगे जाता है। परन्तु संगमेश्वर तक कम-से कम दो जगहों पर सम्भाजी की पाँच पाँच हजार की सेनाएँ तैयार खड़ी हैं। आपको हमारे पीछे पीछे आना है या सीधे सम्भाजी के जबडे में पहुँचना है ?" गणोजी ने किसी को जवाब देने का मौका ही नहीं दिया। अँधेरा होते-होते एक गाँव के मैदान में घोड़े रुक गये। गणोजी द्वारा पहले भेजे सन्देश के अनुसार कोंकण क्षेत्र से खेममावन्त, देशमुख, दलवी जैसे अनेक जागीरदार पूरे प्रबन्ध के साथ वहाँ एकत्र हुए थे। गणोजी से मिलते ही उन लोगों ने उन्हें बाँहों में भर लिया। गणोजी के निर्देश के अनुसार उन लोगों ने चार सौ हृष्ट-पुष्ट घोड़े तैयार रखे थे। मुकर्रब ने शीघ्रता की। उसने थके हारे और जख्मी घोड़ों को बदल दिया। तरोताजा घोड़ों के मिलने से मुस्लिम सैनिक प्रसन्न हो गये। अब संगमेश्वर तक का रास्ता केवल एक रात का रह गया था। अब लगातार तीसरी रात का वह जानलेवा रास्ता आरम्भ हुआ। इसी समय कुछ गुप्तचरों से गणोजी को समाचार मिला। डेढ़-दो दिन पहले शम्भुराजा विशालगढ़ से उतरकर इसी रास्ते से संगमेश्वर से आगे गये हैं। यह खबर सुनते ही मुकर्रब थरथरा गया। उसके सैनिक भी चौकन्ने हो गये। जिस शिकार के लिए पिछली तीन रातों से इस भयानक जंगल में वे कुत्तों की तरह दौड़ रहे थे उस शिकार की गन्ध आसपास के जंगल मे उनकी नाक में आने लगी। यह सोचकर 648 :. सम्भाजी