छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरात समाप्त होने को आयी। आकाश में चाँद और चाँदनी डूबने लगे। दिन निकल आया। सैनिक अपनी जगह पर ही ठिठक गये। पीछे के ऊँचे पहाड़ की खड़ी चट्टान देखकर आँखों के आगे अँधेरा छा गया। अभी तक केवल आधा रास्ता ही पार हुआ था। पीछे ऊँची खड़ी चट्टान और सामने गहरी खाई। सैनिकों और जानवरों की देह भय के मारे गोल-गोल घूमने लगी। रात के अँधेरे के कारण ही वे यह भयानक यात्रा कर सके थे। अन्यथा एक मुकर्रबखान को छोड़कर दूसरा कोई भी सैनिक इन चट्टानों से उतरने के लिए तैयार न होता। दाहिने हाथ की बड़ी खाई और पैरों के नीचे की भयंकर उतराई देखकर जानवर भी हड़बड़ा गये। समीप के पत्थरों और पेड़ों से चिपककर नाक फुलाये खड़े हो गये। मुकर्रबखान जोर से चिल्लाया, "चलो बेवकूफो, जल्दी चलो नहीं तो मराठे पीछे पड़ जाएँगे।" घोड़ों की लगाम पकड़े सैनिक उन्हें नीचे की ओर खींचने लगे। परन्तु एक भी जानवर आगे पैर रखने को तैयार न था। तब जानवरों के शरीर पर बेंत और कोड़े पड़ने लगे। नीचे उतरने के स्थान पर जानवर वहीं पर झुक गये। भयभीत होकर मूतने और लीद करने लगे। किन्तु भय के कारण एक ने भी आगे कदम नहीं बढ़ाया। मुकर्रब ने सभी की ओर संकेत किया। उसने अपनी नुकीली टोपी पर बँधा हुआ साफा खोला और उस लम्बे साफे से अपने घोड़े की आँखें बाँध दीं। अन्य सैनिकों ने भी ऐसा ही किया। जिनके पास साफे नहीं थे उन्होंने अपने लम्बे कुर्ते उतारे और घोड़ों की आँखों पर पट्टी बाँध दी। जो भी हो वह भयानक उतराई घोड़ों की आँखों से दूर हो गयी। उन्हें भी कुछ साहस मिला। उनके पैरों में शक्ति का संचार हुआ। घोड़े अपने मालिकों द्वारा खींची जाने वाली लगाम के सहारे चलने लगे। जानवरों का सहारा लेकर सैनिक भी बचते-बचाते घाटी में उतरने लगे। दोपहर होते-होते तीन हजार की फौज वह दुर्गम घाटी उतरकर एक बार नीचे आ गयी। घाटी में उतरते हुए जब सैनिकों और जानवरों ने सामने का समतल मैदान देखा तो वे खुशी से नाच उठे। सैनिकों के पाँव, मोच खाकर अकड़कर, ऐंठकर, लचककर बेजार हो गये थे। घोड़ों ने सामने घास से भरा मैदान देखा तो खुशी से दौड़ने लगे। अपने शरीर को विश्राम देने के लिए जैसे हाथी पानी में अस्त-व्यस्त होकर लेट जाता है उसी तरह घोड़े घास पर लोटने लगे। सिपाहियों ने भी बकरी के बच्चों की तरह उछलते हुए अपने को घास पर झोंक दिया। विश्राम कर रहे सैनिक और घोड़े रस्सी की तरह लटकने वाली चट्टान की पगडंडी को आश्चर्य से देख रहे थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे सचमुच इसी पगडंडी से उतरकर नीचे आये हैं। घास के मैदान पर सैनिकों और घोड़ों का फैला हुआ वह मेला बगल के सम्भाजी :: 647