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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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को कँपा देती थी। बचे हुए घोड़े अपनी जगह पर रुक जाते और भय से देखते हुए मूतने लगते। उतराई पर पैरों की गति इतनी धीमी हो जाती कि समझ में ही नहीं आता कि यह कठिन राह कभी समाप्त भी होगी या नहीं? दूसरी ओर की घाटी से रात की ठंडी हवा शरीर को छू रही थी। परन्तु घबराये हुए मनुष्यों और जानवरों को पसीने छूट रहे थे। उनका शरीर पसीने से तर हो रहा था। उस दानवी रास्ते ने देखते-देखते चालीस घोड़ों को निगल लिया। उस रात के अँधेरे में अनेक प्राणी पहाड़ से नीचे गिर गये। कुछ पन्द्रह-सत्रह फौजियों के जाते मुकर्रबखान के पेट में भी भय का गोला घूमने लगा। मुकर्रब के साथी उसके आसपास इकट्ठे हुए। अँधेरे के कारण उनके चेहरे का भाव स्पष्ट नहीं हो रहा था। किन्तु उनकी अवरुद्ध साँस, नाक से निकलने वाली गर्म हवा एक ही प्रश्न पूछ रही थी, "खान साहब! इस मौत के कुएँ में हमें लेकर कहाँ जा रहे हैं?" मुकर्रब ने उन्हें निश्चयपूर्ण शब्दों में उत्तर दिया, "मैंने तो पहले ही कह दिया था कि जिन्हें मौत कबूल हो वही हमारे साथ चलें।" मुकर्रब के इस उत्तर से रुके हुए पैर फिर से चलने लगे। घोड़ों के पैरों में गति आ गयी। उतार पर चलते हुए जंघाओं और पिंडलियों में गोले फूट रहे थे। पैरों के फिसलने से नाखूनों का टूटना-फूटना तो मामूली बात थी। अनेकों के पैर फिसले और वे मोच खाकर पंगु हो गये थे। उस भयंकर उतार पर अब कोई किसी के लिए रुकने को तैयार न था। घोड़े एक-दूसरे के शरीर को रगड़ते हुए चल रहे थे। सैनिक एक-दूसरे को हाथों का सहारा दे रहे थे। ठंड से ठिठुरते हुए सैनिक और जानवर किसी प्रकार अंपनी जान बचाते हुए नीचे उतर रहे थे। बीच में किसी सैनिक का पैर फिसल जाता तो वह लकड़ी के गट्ठे की तरह बगल की खड़ी चट्टान से नीचे गिर जाता। 'या खुदाऽऽ, या खुदाऽऽ' की करुण चीत्कार की ओर कोई ध्यान न देता। नीचे गिरा सैनिक किसी का चचेरा या मौसेरा भाई हुआ तो भी कोई ध्यान न देता। सभी को अपनी जान बचाकर जल्दी से नीचे उतर जाने की चिन्ता थी। गिरे हुए सैनिक के सम्बन्ध में केवल 'कौन था?' जैसी मामूली पूछताछ कर ली जाती थी। आगे बढ़ते सैनिक अपने ठिठुरते स्वर में एक-दूसरे से बीच बीच में कानाफूसी करते, 'यह शैतान गणोजी हमें कहाँ लिये जा रहा है?' इस प्रकार के घने जंगल, पहाड़ियाँ, घाटियाँ हमेशा मराठों के अनुकूल होती हैं। यही सोचकर मुकर्रब की फौज को भय लग रहा था। मराठे यदि बन्दरों की तरह छलाँग लगाते अचानक सामने आ जाएँगे तो हम जाएँगे कहाँ? इस शैतानी रास्ते में नष्ट हो जाने का खतरा था। भय के कारण घोड़ों के मुँह से फेन निकल रहा था। उनकी पीठें पसीने से भीगी थीं। 646 :: सम्भाजी