छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंघात और अपघात एक ऐसा भयानक धोखा करने वाला और भयंकर ढलान वाला जंगल अपने सात जन्मों में भी नहीं देखा था। पिछले एक दिन और एक रात इन लोगों ने बड़ी दौड़ की थी परन्तु अणुस्कुरा के जंगल में उतरते ही उन्हें छठी का दूध याद आ गया। अणुस्कुरा घाटी की उतराई इतनी कँटीली और ढालू थी कि पहले झटके में ही मुगल फौज का सारा जोश ठंडा पड़ गया। मुकर्रबखान, इखलास और गणोजी के साथ सभी लोग चुपचाप घोड़ों से उतर गये। जहाँ जानवरों को खाली शरीर भी उतर पाना कठिन हो रहा था वहाँ पीठ पर बोझ लादकर कैसे उतरते ? घाटी की उतराई पर ऊँचे-ऊँचे पेड़, घनी लताएँ, कँटीली झाड़ियाँ, घनी जंगली घास आदि भरे पड़े थे। इसलिए जमीन तक चन्द्रमा की किरणें तक नहीं पहुँच पा रही थीं। जिस पगडंडी पर वे चल रहे थे वह भी हाथ-डेढ़ हाथ से अधिक चौड़ी न थी। उस रास्ते से एक बार में केवल एक घोड़ा आगे बढ़ सकता था। वह उतराई की राह कभी उल्टी-पुल्टी गोलाकार होती तो कभी एक लकीर की तरह सीधी हो जाती, कभी तिरछी होती तो कभी सर्पीली तो कभी सिर तक ऊँची घासों के बीच में छिप जाती थी। कभी-कभी ऐसा लगता कि वह लकड़ी का सहारा लेकर थकी हुई किसी बुढ़िया की तरह धीरे-धीरे नीचे उतर रही है। कभी-कभी नीचे फैली काई के कारण घोड़ों के पैर रपट जाते और भयभीत जानवर आसपास किसी पत्थर की चट्टान देखकर सहारा पाने के लिए उस पर अपने को झोंक देते। इस प्रकार अपनी लम्बी जीभ को बाहर निकालकर प्राणों की रक्षा का उपाय करते। परन्तु कुछ घोड़े पत्थरों और सूखी घासों से इस प्रकार फिसलते कि उनके सावधान होने के पहले ही उनका सन्तुलन बिगड़ जाता था। जैसे कोई भरी गागर किसी खाली कुएँ में गिर जाये वैसे ही ये घोड़े बगल की घाटी में गिर जाते थे। कँटीली झाड़ियों से होकर गिरने वाले घोड़ों की करुण चीत्कार फौज के कलेजे सम्भाजी :: 645