छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
से कहा, "गणोजी आप घबराइये नहीं। हम आपको अगुआइ करने के लिए नहीं कहेंगे। आपको फौज के पीछे रखेंगे। किन्तु किसी भी स्थिति में आपको साथ तो चलना ही है।" "परन्तु सरकार आपके साथ रसद, राह दिखाने वाले सब कुछ दे देता हूँ किन्तु मुझे वापस जाने की इजाजत दीजिए।" गणोजी ने दोनों हाथ जोड़कर घबराये हुए स्वर में कहा। पहले ही देर हो चुकी थी। फौज बीच में रुकी थी। गणोजी ऐन मौके पर हिम्मत हार रहा था। यह देखकर मुकर्रब लाल-पीला होने लगा। घोड़े पर से ही अपने मजबूत दाहिने हाथ से गणोजी के गले की पट्टी पकड़कर खींचा और कहा, "शिर्के, तुम क्या मुझे मूर्ख समझते हो? तुम्हारे बाप दादों ने कुछ शताब्दी पहले इन्हीं जंगल-घाटियों में सात हजार की फौज के साथ मलिक उत्तुजार बन्दे को धोखे से मार दिया था। वैसी स्थिति आयी तो मैं भी डूब मरूँगा लेकिन तुम्हें साथ लेकर। चलो, बचपना छोड़ो।" छिटकी चाँदनी में फौज की दौड़ पुनः आरम्भ हो गयी। घोड़े सरपट भाग रहे थे। रास्ते की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ और खाइयाँ पीछे छूटती जा रही थीं। भोर के समय संगमेश्वर से निकलकर आ रहे कुछ पथिक मिले। उनसे खबर मिली कि कल दिन भर सम्भाजी राजा संगमेश्वर में ही थे। किन्तु आने वाली सुबह को रायगढ़ की ओर निकलने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही मुकर्रब के घोड़ों को मानो पंख उग आये। मुकर्रब, इखलास और गणोजी साथ तीन हजार की फौज तेजी से भागते हुए कँटीले रास्ते को पार करने लगी। संगमेश्वर के संगम पर जीवन-मृत्यु की आर-पार की लड़ाई ही अब उनका एकमात्र लक्ष्य था। दो पानी में छपाक से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी। येसूबाई की आँख एकाएक खुल गयी। वे बिस्तर पर उठ बैठीं। उन्होंने अनुमान लगाया कि पीछे की नदी में कोई पेड़ की डाली गिरी होगी। येसूबाई अचकचाकर इधर-उधर देखने लगीं। महल के पर्दे हल्की हवा से सरसरा रहे थे। पर्दों के साथ बँधे घुँघरुओं की भी आवाज आ रही थी। चिरागदान का तेल समाप्त होने को आया था। थोड़ी देर पहले 650 :: सम्भाजी
ही पानी में उठी उस आवाज से घर के बाहर बँधे घोड़े हिनहिनाए थे और फिर शान्त हो गये थे। थके-हारे शम्भू महाराज बिस्तर पर लकड़ी की तरह बेसुध पड़े थे। येसूबाई को पसीना छूट रहा था। मुँह से शब्द निकल नहीं रहे थे। इतना भयानक स्वप्न उन्होंने जिन्दगी में कभी नहीं देखा था। वे अपने मस्तिष्क में स्वप्न की टूटी कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही थीं। दिमाग पर बहुत दबाव डालने पर वह दुःस्वप्न उनकी मन की आँखों के आगे फिर से घूम गया। ऐसी दानवी भैयादूज संसार की किसी बहन ने भी कभी स्वप्न में भी नहीं सोची होगी। येसूबाई पसीने से भीग रही थीं। सपने में उन्होंने देखा कि वे भैयादूज के लिए सुन्दर रंगोली सजाकर भाई के लिए चन्दन की चौकी रखी। पूजा की थाली और उपहार की वस्तुएँ तैयार कीं। किन्तु चौकी पर भाई की जगह उन्हें कोयले का ढेर दिखाई पड़ा। ऐसे कोयले जिन्हें अभी-अभी धधकती आग से निकालकर बुझाया गया हो। आरती की सोने की थाली के समीप दिखने वाला हाथ परिचित था। उस कलाई पर सर्पाकार सुवर्ण कंगन निश्चय ही गणोजी का था। सपने में भी आरती उतारने के बाद येसूबाई ने अपना सिर गणोजी के पैरों में रख दिया था। परन्तु अपने भाई से मिले भयानक उपहार से वे थरथर काँप रही थीं। भय से कलेजा मुँह को आ रहा था। पूजा की थाली में वह उपहार! वह रेशम जैसे लम्बे-लम्बे केश कलाप, ताजे खून से चिपकी दाढ़ी, किसी शिल्पाकृति की भाँति अधखुली गहरी आँखें और थाली में गिरा वह खून। यह सिर तो शम्भू महाराज का है। येसूबाई जोर से चिल्लाने को हुई। परन्तु समीप ही गहरी नींद में सोये सम्भाजी पर उनकी दृष्टि पड़ी। ऐसा लगा जैसे किसी लम्बी यात्रा से लौटा चन्द्रपुर का कोई राजकुमार मेघों की दुलाई ओढ़े शान्तिपूर्वक सोया हो। शम्भूराजा की मुद्रा जितनी थकी हुई थी उतनी ही पवित्र लग रही थी। येसूबाई का दम घुट रहा था। महल के अलिन्दों से आने वाली तेज हवा पेड़ों से गिरने वाले पत्तों को ही नहीं पूरे ब्रह्माण्ड को भयभीत कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने इस संगमेश्वर के वन प्रदेश को अपने वश में कर लिया हो। यहाँ अधिक समय तक रुकना नहीं है ऐसा आग्रह उन्होंने पिछली रात ही शम्भू महाराज से किया था। रात की मन्त्रणा पूरी होने के बाद शम्भूराजा ने अपने सहकारियों से कहा, "जिनके लिए सम्भव हो वे इसी समय निकल जायें। जिसके लिए जो जगह निश्चित की गयी है, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायें। उसी समय सेना की कुछ टुकड़ियाँ सगमेश्वर से निकल पड़ीं। किन्तु शम्भूराजा के पैर थम गये। उन्होंने अर्जोजी यादव के निवेदन को सुनने का वचन दिया था। दूसरे कुछ अन्य गरीबों को सम्भाजी :: 651
न्याय देना था। इन सभी कार्यों को निपटाकर नाश्ते से पहले संगमेश्वर छोड़ देने का शम्भूराजा ने निश्चय किया था। येसूबाई तत्काल निकलने का आग्रह कर रही थीं। तब म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "बहूरानी इतनी जल्दी क्यों मचा रही हैं। कल सवेरे सब लोग निकलेंगे।" "ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु, " "बेटी सुनो! रात को घाट से यात्रा करते समय कुछ मालूम नहीं पड़ता। आकाश की छिटकी चाँदनी मामूली चिराग की तरह रोशनी देती है। पैरों के नीचे की जमीन भी किसी प्रकार का धोखा नहीं देती।" "परन्तु यहाँ किस बात का भय है?" "यह कोंकण की बस्ती है। यहाँ पेड़ों की घनी छाया के कारण चाँदनी भी जमीन तक नहीं पहुँच पाती। इसके यहाँ मणियार, फेटार कराइत जैसे विषधर पाए जाते हैं। तुम शृंगारपुर में पली-बढ़ी हो। तुम्हें यह सब बताने की आवश्यकता है क्या?" अनेक आग्रह थे। किन्तु येसूबाई ने संगमेश्वर के सूबेदार को आदेश दिया था कि चाहे जो भी हो एकदम सुबह निकलना है। उन्होंने यह भी कहा था कि पालकी और ढोने वाले मजबूत कहारों को तैयार रखे। किन्तु रात को मोने के पहले सूबेदार मोरे दौड़ते हुए आये। उन्होंने सूचना दी कि औंध से अर्जोजी और गिरोजी यादव यहाँ पहुँच गये हैं। राजा ने तीन दिन पहले उन्हें विशालगढ़ पर संगमेश्वर में मिलने का समय दिया था। अर्जोजी एक विश्वासपात्र आदमी थे। दुर्गाबाई और राणू दीदी को बहादुरगढ़ में मिलने के लिए उन्होंने छद्मरूप से प्रवेश किया था। शम्भूराजा के सामने संकट था कि यादव बन्धुओं की बात कल सुबह सुनें या आगे का समय दें। किन्तु यह बात भी सच थी कि यादव बन्धु पिछले कई वर्षों से त्रस्त थे। सूबेदार ने धीरे से कहा, "महाराज और भी दो तीन प्रार्थना पत्र हैं।" "ठीक है, सबकी फरियाद सुनेंगे। परन्तु इन सभी को सूर्योदय से पहले यहाँ आने को कहिए। नाश्ते से पहले सभी मामलों को समाप्त करना होगा। वहाँ रायगढ पर कामों का अम्बार लगा है।" शम्भूराजा ने कहा। येसूबाई को इन मामलों में समय गँवाना उचित नहीं लग रहा था। आधी रात देखा हुआ वह भयानक स्वप्न येसूबाई के रक्त के प्रत्येक कण में व्याप रहा था। उन्हें लग रहा था कि जितनी जल्दी यहाँ से निकल जायें उतना ही अच्छा। प्रातःकाल महाराज उठ गये। उन्होंने स्नान करके पूजा की। येसूबाई ने भी स्नान करके पूजा की। इसी बीच सूबेदार ने आकर कहा, "महाराज! बाहर पालकी आदि सब तैयार है।" येसूबाई की चिन्ताग्रस्त मुखमुद्रा को देखकर शम्भूराजा ने कहा, "महारानी आप इतनी चिन्तित क्यों हैं? आप आगे निकलिए हम भी पीछे-पीछे घोड़ा भगाते 652 . सम्भाजी
हुए आ जाएँगे।" "महाराज! आज का दिन अशुभ-सा लग रहा है। यहाँ पर बिलकुल न रुकिए।" "ऐसा बर्ताव हम कैसे कर सकते हैं? हम इस प्रदेश के राजा हैं। मैंने यादवों को मिलने का वचन दिया था। यादव बन्धु आते ही होंगे।" सूबेदार ने कहा, "वे गये ही कहाँ थे? कल रात से ही ड्योढ़ी पर अड्डा जमाये बैठे हैं।" "सुनो येसू? जैसे दहाड़ मारकर रोते हुए बच्चे को छोड़कर कोई माँ नहीं जा सकती वैसे ही दरवाजे पर न्याय माँगने के लिए खड़ी प्रजा को छोड़कर कोई राजा आगे नहीं जा सकता।" सूचना देने के लिए सूबेदार बाहर चला गया। येसूबाई के पीछे-पीछे शम्भू महाराज भी भीतर के दालान में आ गये। परन्तु येसूबाई की भीतरी घबराहट उन्हें शान्ति से बैठने नहीं दे रही थी। आवेश में वह बगल के खम्भे पर हाथ रखकर रोने लगीं। यह देखकर शम्भूराजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे महारानी के समीप आये। जैसे कोई लता वृक्ष से लिपट जाती है येसूबाई ने उसी तरह शम्भूराजा को बाँहों में भर लिया। शम्भू महाराज बिना कुछ बोले येसूबाई के सिर पर हाथ फेरने लगे। उन्हें सान्त्वना देते हुए विनोदभाव मे बोले, "येसू आज तुम्हें क्या हो गया है? पूरे महाराष्ट्र को कठोर अनुशासन में रखने वाली हमारी महारानी आज एक सामान्य घरेलू औरत की तरह व्यवहार क्यों कर रही है? तुम्हारा प्रभुत्वमय और रोबदार अनुशासन कहाँ चला गया?" शम्भूराजा कुछ भी सुनने को तैयार न थे। उन्होंने येसूबाई को आश्वस्त किया कि नाश्ते तक यहाँ का सारा काम पूरा करके हम निकल चलेंगे। निकलने का सारा प्रबन्ध हो जाने पर सूबेदार ने पुनः आकर सूचना दी। तब शम्भूराजा ने येसूबाई से कहा, "आपकी पालकी के साथ आठ सौ घोड़े निकलेंगे।" "इतने किसलिए? फिर आपके साथ कौन रहेगा?" येसूबाई ने कहा। "चार सौ घोड़े रहेंगे मेरे साथ।" "नहीं, नहीं राजा की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।" "नहीं येसू, दुर्गाबाई और राणूदीदी की याद के अंगारे हमें जीवन भर जलाते रहे हैं। तुम्हारे ऊपर कोई भी संकट नहीं आना चाहिए।" "फिर हम ऐसा करेंगे कि साथ-साथ ही निकलेंगे।" "नहीं, नहीं आप निकलिए।" अन्तःपुर में कोई अन्य व्यक्ति नहीं था। येसूबाई ने शम्भूराजा के पैरों पर अपना सिर रखकर गर्म आँसुओं के फूल चढ़ाए। उनकी यह दशा देखकर शम्भूराजा का मन भर आया। उन्होंने अपनी प्रिय महारानी को बड़े वात्सल्य से सीने से लगा सम्भाजी :: 653
लिया। राजा के उस प्रगाढ़ आलिंगन में येसूबाई को अपने पिता पिलाजीराव का स्मरण हो आया। येसूबाई की आँखों के आँसुओं को अपनी उँगलियों से पोंछते हुए शम्भू महाराज ने हँसते हुए कहा, "इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? तुम्हें इतना भी भरोसा किसी पर न रहा? सह्याद्रि का यह हरा-भरा जंगल, यहाँ की यह लाल मिट्टी, शिवाजी के पुत्र सम्भाजी के साथ धोखा करेंगे? क्या तुम्हें ऐसा लगता है?" बहुत विलम्ब हो रहा था। बाहर दिन निकल आया था। सूर्योदय के पूर्व ही संगमेश्वर से बाहर निकल जाना था। दरवाजे पर पन्द्रह-बीस पालकियाँ तैयार खड़ी थीं। कुछ दासियाँ भी साथ थीं। राजा को एक बार पुनः प्रणाम करके येसूबाई अपनी पालकी में बैठ गयीं। चन्दनी मेहराब के झरोखे से वे बाहर झाँकने लगीं। महल की सीढ़ियों पर शम्भू महाराज खड़े थे। राजा को दंडवत करके कहारों ने पालकी उठा ली। उसी समय शम्भू महाराज ने धीमे स्वर में कहा, "रुको!" महाराज तेजी से चलते हुए पालकी के पास आ गये। येसूबाई ने पूछा, "क्या बात है स्वामी?" "महारानी जरा भी चिन्ता न करें। आपकी पालकी दोपहर को चिपलूण की वशिष्ठी नदी के किनारे पहुँचेगी। वहाँ अमराई में दशमी का निवाला मुख में रखने से पहले ही मैं घोड़ा दौड़ाते वहाँ पहुँच जाऊँगा।" राजा के इस प्रकार भरोसा देने से येसूबाई उस वियोग के क्षण में भी बड़ी मधुरता से हँस पड़ी। शम्भूराजा ने पुनः कहा, "परसों हम रायगढ़ के पायदान तक पहुँच जाएँगे। वहाँ आपको एक महत्त्वपूर्ण कार्य करना है।" "कौन-सा?" "प्रवेशद्वार के चितदरवाजे पर लगने वाली पत्थर की देहरी को ध्यान से देखकर रखिए।" "किसलिए?" "आने वाले कुछ दिनों में हम अवश्य ही विजयी होंगे। वह औरंगजेब कहीं-न-कहीं मुझे अवश्य ही मिलेगा। उमका सिर काटकर हमें उसी देहरी के पत्थर के नीचे दफनाना है।" तीन प्रातःकाल होते ही दरबार की कार्यवाही आरम्भ हुई। महाराज घंटे-दो घंटे के लिए वहाँ रुकने वाले थे। यह जानने पर सन्ताजी, धनाजी, कवि कलश और खंडो 654 :: सम्भाजी
बल्लाल ने भी वहीं रुकने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि महाराज के निकलने के साथ ही वे भी निकलेंगे। इस बीच रंगनाथ स्वामी और कवि कलश के बीच आध्यात्मिक विषयों पर रात से ही चर्चा चल रही थी। यह चर्चा अनेक धार्मिक अनुष्ठानों और विधियों पर हो रही थी। दोनों ही शम्भूराजा के लिए बहुत चिन्तित थे। दिन निकल आया। लोगों के नित्य के क्रिया कलाप आरम्भ हो गये। किन्तु फरवरी महीने की ठंडक अभी विद्यमान थी। महाराज ने बाग की खुली हवा में फरियादें सुनने का निर्णय लिया था। सेवकों ने तत्काल गद्दे तकिये लगा दिये। सूरज की कोमल किरणें ऊँचे पेड़ों से नीचे झरकर मृगशावकों की भाँति आसपास खेलने लगीं। पीछे शास्त्री नदी पर कुहरे के ढेर के ढेर आसमान की ओर सरकने लगे। बगीचे में शम्भूराजा द्वारा न्यायदान का कार्य आरम्भ हुआ। खंडो बल्लाल की कलम तेजी मे चल रही थी। महाराज मामलों के निर्णय में व्यस्त थे। कवि कलश ने समय का उपयोग करना चाहा। स्वामी जी और कवि कलश शास्त्री नदी पर गये। उन्होंने वहाँ रेती पर कुछ पूजा-विधि सम्पन्न की। शम्भूराजा के सुख और कल्याण के लिए देवी-देवताओं की पूजा की जा रही थी। अर्जॉजी और गिरजोजी स्वभाव कृपण थे। दोनों यादव बन्धु अपनी अपनी कैफियत रख रहे थे। शम्भू महाराज गर्मी और धूप को बढ़ते हुए देखकर बेचैन हो रहे थे। उन्होंने यादव बन्धुओं से आग्रह किया, "मुद्दे की बातें करिए, शब्दजाल न फैलाइये।" किन्तु यादव बन्धु पीछे हटने को तैयार न थे। उनकी फरियाद सुनने में लगभग पौने दो घंटे बीत गये। शम्भूराजा ने पूरी बात सुनी और खंडो बल्लाल को निर्णय लिखने के लिए बताया। वहाँ उपस्थित गरीब जनता की शिकायतें कुछ बड़ी न थीं। उन सभी पर आधे घंटे में शम्भू महाराज ने विचार कर लिया। किन्तु अब तक बढ़ती धूप की आँच आने लगी थी। सुबह के नौ बजने को आये। महाराज एक अति गरीब व्यक्ति की फरियाद सुनने में व्यस्त थे। इतने में जैसे किसी के पेट में भाला घुस जाये और वह चीखने- चिल्लाने लगे, उसी तरह दूर से आक्रमण का शोर सुनाई देने लगा। महाराजऽऽ, महाराजऽऽ, गजब हो गया। धोखा हो गया है। उस आवाज को सुनकर शम्भूराजा धक्क से रह गये। बगल में रखी तलवार हाथ में लेकर खड़े हो गये। दरवाजे पर हलचल मच गयी। बाग के शोरगुल को सुनकर कवि कलश भी तेजी से नदी की कछार चढ़कर ऊपर आ गये। इसी बीच एक हरकारा पसीने से तर-ब-तर शम्भू महाराज के सामने आकर खड़ा हो गया। जिस घोड़े पर वह सवार था, उसके मुँह से फेन गिर रहा है। उसके घुटने पथरीले रास्ते पर दौड़ते दौड़ते फट गये थे। हरकारा बड़े लाचार स्वर में सम्भाजी :: 655
चीखते हुए कहने लगा, "महाराज, दुश्मन, संगमेश्वर पर आक्रमण करता चला आ रहा है। छह सात सौ सवारों का दल मैने अपनी आँख से देखा है, महाराज।" इधर-उधर घूम रहे सैनिक अपने-अपने घोड़ों पर सवार हो गये। शंभूराजा ने जोर से आवाज दी, "पाखऱ्याऽऽ"। पाखऱ्या नाम का उनका घोड़ा दौड़ता हुआ पास आ गया। पाखऱ्या महाराज के सामने आकर खड़ा हो गया। आगे की यात्रा के लिए वह पहले से ही सोने और हीरे-मोतियों के गहनों से सज गया था। अपने स्वामी के स्वर की हताशा उसकी समझ में आ गयी। शम्भू महाराज शीघ्रता से घोड़े की पीठ पर सवार हो गये। रणांगण में शत्रु का सामना करने के लिए कवि कलश पहले ही तैयार हो गये थे। वृद्ध म्हालोजी घोड़पड़े की आँखों से आग की लपटें निकलने लगीं। उन्होंने हथेलियों पर जल्दी-जल्दी तम्बाखू मली और जबड़े में रखा। हाथ के भाले की चमचमाती नोंक को ऊपर उछाला। चार-पाँच सौ सैनिकों को लेकर सुरक्षात्मक युद्ध कैसे किया जाय? इसकी योजना शम्भू महाराज ने शीघ्रता से निश्चित की। इतने में सामने के हरे भरे पेड़ों के पीछे से शोर सुनाई देने लगा, 'अल्लाहो अकबरऽऽ अल्लाहो अकबरऽऽ, दीनऽ दीनऽऽ' पीछे से आते मुगलों के घोड़े सामने दिखाई देने लगे। इधर से म्हालोजी घोड़पड़े ने 'हर हर महादेवऽऽ' का नारा लगाया। उसके बाद सन्ताजी और धनाजी जैसे युवकों ने जोरदार गर्जना की, 'शिवाजी महाराज की जयऽऽ, सम्भाजी महाराज की जयऽऽ' घोड़े घोड़ों से भिड़ गये। तलवारें बजने लगीं। घोड़े हिनहिनाने लगे! लोग बेहोश होकर गिरने लगे। चौड़ी पीठ वाले एक ऊँचे घोड़े पर मुकर्रबखान बैठा था। उसने चमड़े का कुर्ता पहन रखा था। तीन-चार दिन की लगातार यात्रा से वह पूरी तरह थक गया था। किन्तु लड़ाई के मैदान में उसने जैसे ही शम्भू महाराज को देखा, उसके शरीर में भयंकर जोश व्याप गया। इसी अकेले शम्भू को मारने या पकड़ने की आकांक्षा से वह पिछले कितने दिनों से पागल हो रहा था। देखते-देखते मुगलों ने शंभूराजा की कोठी और सामने के परिसर को घेर लिया। कुछ लोग नदी की ओर भागे, किन्तु शत्रुओं ने उस रास्ते को भी रोक दिया। आरम्भ से मुगल भारी पड़ रहे थे। मुगलों के पास कम से कम हजार-बारह सौ घोड़े थे। उनसे चारों ओर से घिरे शम्भू महाराज के चार सौ सैनिक बहुत विवश दिखाई दे रहे थे। इतने वर्षों से पीछा करने के बाद; लाखों सैनिकों की हानि, सुदीर्घ प्रयास, जानलेवा मानसिक यातना के बाद भी अप्राप्य-सा सम्भाजी घात-अपघात से अप्रत्याशित रूप से हाथ लग रहा था। इस कल्पना मात्र से मुगल सैनिकों में अपार जोश भर गया था। सपासप तलवार चलाते हुए मुगल सैनिक शम्भू महाराज की ओर बढ़ रहे थे। मराठी सेना सैनिकों की भयंकर बाढ़ में टूटी नाव की तरह अटकी 656 :: सम्भाजी
दिखाई दे रही थी। आरम्भ में इस अकल्पित और अनपेक्षित आक्रमण से मराठी सैनिक घबरा गये थे। किन्तु जब अपने प्राणों से प्रिय राजा की जान का खतरा उन्हें महसूस हुआ तो सभी मराठी सैनिक भड़क उठे। सन्ताजी और खंडो बल्लाल तो आग-बबूला हो उठे। उन्होंने अपने भाले सँभाले। मराठों के घोड़े मुगलों के घोड़ों पर आक्रामक हो उठे। 'पकड़ो', 'मारो', 'कुचल दो' जैसे शब्द युद्धभूमि में लाई की तरह फूटने लगे। कुछ मराठा सैनिक बगल के घने पेड़ों और झाड़ियों की आड लेकर भाले चलाने लगे। अपने राजा को बचाने के आवेश और जोर-जोर से चिल्लाने से इतना शोर उठा कि मुकर्रब को लगा कि जितने लोग सामने हैं उसके दुगुने झाड़ियों में छिपे हैं। परन्तु अपने प्राणों की चिन्ता किये बिना मुकर्रब सम्भाजी की ओर दौड़ पड़ा। मुगल सैनिकों ने एक साथ सम्भाजी को चारों ओर से घेरने का प्रयास किया। शम्भू महाराज भी ऐसी लड़ाई नहीं किये थे। इसलिए उनके रक्त-मांस में असीम जोश भर गया था। शम्भुराजा के मजबूत हाथों में बहुत पैनी धार वाला भाला था। अपनी पूरी ताकत लगाकर वे तलवारबाजी कर रहे थे। दीवाली के अवसर पर जैसे चकरी चिनगारियाँ चारों ओर बिखेरती अपनी जगह पर घूमती है उसी तरह शम्भू महाराज अपनी जगह पर चारों ओर घूमते हुए अपना घोड़ा नचा रहे थे। शम्भुराजा की सहायता के लिए धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल एक साथ आगे बढ़े। उन्होंने अपने घोड़ों को आक्रामक बनाया। उन्होंने भयानक तलवारबाजी की। इसी बीच नदी की ओर से कुछ पठान धोखे से शम्भुराजा पर टूट पड़े। उनका मुकाबला करने के लिए शम्भुराजा उनकी ओर मुड़े। मुकर्रब इसी बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि शम्भुराजा उसकी ओर से किसी तरह असावधान हों। अपने हाथों में हैदराबादी नंगी तलवार लिए मुकर्रब शम्भू महाराज की ओर दौड़ा। शम्भुराजा की पीठ उसकी ओर थी। मुकर्रब अपने घोड़े को दौड़ाते हुए शम्भू महाराज के घोड़े पर चढ़ाने लगा। उसकी तलवार चमक उठी। वह ऐसा वार करना चाहता था कि कम से कम शम्भू महाराज का एक हाथ कन्धे से अलग हो जाय। इसी उम्मीद से उसने शम्भुराजा पर तलवार चलाई। किन्तु इसी बीच एक चमत्कार घटित हुआ। शम्भुराजा के शरीर पर तलवार पहुँचे इसके पहले ही बीच में कोई आ गया। अपने घोड़े से छलाँग लगाकर शम्भुराजा के घोड़े पर कोई आ गया और शम्भुराजा को अपनी गोद में ले लिया और शम्भुराजा के लिए आड़ बन गया। खान की तलवार उस व्यक्ति के कन्धे में कचकचाकर धँस गयी। हड्डियाँ चूर चूर हो गयीं। चारों ओर गर्म खून के फौवारे उड़ने लगे। शम्भुराजा का मखमली कुर्ता भी गर्म लहू से भीग गया। राजा की जान बचाने के लिए अपनी कुर्बानी देने वाला यह हृष्ट-पुष्ट सम्भाजी .. 657
व्यक्ति बीच में गिर पड़ा। शम्भुराजा ने अपना घोड़ा घुमाया और रक्तस्नात उस व्यक्ति की ओर देखा। ये थे सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े। म्हालोजी बाबा के धराशायी होते ही मराठे पूरी तरह भड़क उठे। सन्ताजी को अपने पिता के शव की ओर देखने का अवकाश नहीं था। सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल आदि जान लगाकर लड़ रहे थे। इसी समय किसी ने मुकर्रब के घोड़े के कूल्हे पर तलवार से जोरदार आघात किया। पैरों की हड्डियाँ टूट जाने से घोड़ा जोर से हिनहिनाता हुआ बगल में गिर गया। घोड़े के नीचे आने के पहले ही खान ने दूसरी छलाँग लगा दी। इससे पहले किसी ने मुकर्रब को प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं था। परन्तु अपने पहनावे और रोब- दाब से वही मुगल सरदार लग रहा था। शत्रु का सरदार बिना घोड़े का हो गया है, यह देखकर मराठे उसकी ओर दौड़े। मुगल सैनिक भी पूरे जोश में थे। दोनों दल के सैनिकों में घमासान युद्ध हो रहा था। एक दूसरे की गर्दनों पर तलवारें भाँज रहे थे। तलवारों के चपल वार से सिर कट-कटकर बगल में गिर रहे थे। लाल खून से पूरा बगीचा भर गया था। घोड़े से नीचे गिरना मुकर्रब को अपशकुन-सा लगा। मुगल सैनिकों ने उसे पीछे खींच लिया। सिपाही मुकर्रब को दूसरे घोड़े पर बिठाने लगे। इस बीच मराठों ने उन्हें दबाते-कुचलते बगीचे से बाहर निकाला। इसी समय दूर विश्राम कर रहे पचास-साठ मराठी सैनिकों का दल 'हर-हर-महादेव' की गर्जना करते हुए बड़े वेग से महादरवाजे से निकलकर आया। मुकर्रब की दृष्टि उस ओर गयी। उसे लगा कि कोठी में अभी भी हजार-दो हजार की फौज होगी। मराठों का मुकाबला कठिन और जानलेवा था। दूसरे घोड़े पर बैठते हुए मुकर्रबखान ने अपने आसपास देखा तो सैकड़ों पठानों और दक्खिनी मुसलमानों के शव बिखरे पड़े थे। उसके बारह सौ में से कम-से-कम चार सौ सैनिक जान गँवा चुके थे। खान उस जंगल की रहस्यमयी कोठी और आसपास के हरे-भरे जंगल से पूरी तरह घबरा गया। अपनी बची-खुची सेना को उसने धीमे स्वर में आदेश दिया, "भागो पीछेऽऽ।" शत्रुसेना लड़ाई छोड़कर पीछे हट गयी। शम्भुराजा की दृष्टि बगीचे पर गयी। खलिहान में मक्के के गट्ठों की तरह चारों ओर शव बिखरे पड़े थे। जो जिन्दा थे वे तड़प रहे थे, चिल्ला रहे थे, 'या अल्लाह।' 'हे भगवानऽऽ' कराहने की ऐसी आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। घायल घोड़ों का पीड़ा से हिनहिनाना सुना नहीं जा रहा था। अपनी हुकूमत के इलाके में शत्रु इतनी दूर तक कैसे चला आया ? यह सोचकर शम्भुराजा को धक्का लग रहा था। चारों ओर के रास्ते पर सेनाएँ तैनात हैं, हर चौकी पर पहरे लगे हैं। समुद्र से लेकर थल तक के रास्ते पर कड़े पहरे लगे फिर वह शत्रु इतने समीप तक कैसे आ गया? निश्चय ही कहीं धोखा हुआ है। किसी धोखेबाज की उँगली पकड़कर ही शत्रु-सेना यहाँ तक आ पायी है। 658 :: सम्भाजी
अधिक विचार करने का समय नहीं था। कम से कम साढ़े तीन सौ मराठे बलिदान हो चुके थे। शम्भुराजा के साथ केवल सौ-सवा सौ मावल ही बचे थे। सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल जैसे मँजे हुए वीर शम्भू महाराज के अगले आदेश की प्रतीक्षा करते खड़े थे। अगली यात्रा जल्दी हो सके, इसलिए राजा ने अपनी लड़ाकू सेना को बड़े आत्मविश्वास के साथ कल रात से ही भेजना आरम्भ कर दिया था। अब उनके साथ बहुत मामूली संख्या में फौज थी। पेड़ों और कँटीली झाड़ियों से भरी यह दुर्गम जगह जहाँ सूर्य की किरणें भी सरलता से नहीं पहुँच पातीं वहाँ शत्रु पहुँच जाएगा, वह भी इतनी सरलता से, ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था। खंडो बल्लाल, धनाजी सहित अनेक वीरों के छोटे-बड़े घावों के कारण उनके कपड़े खून से सने थे। अभी भी अनेक सैनिकों के ललाट और गालों से खून बह रहा था। लड़ाई के दौरान एक पठान का बाण कवि कलश की कलाई में घुस गया था। उन्होंने जल्दी जल्दी में पट्टी बँधाई थी, परन्तु खून अभी भी रिस रहा था। इसी समय किसी तरह अपनी जान बचाते हुए दो गुप्तचर भागते हुए वहाँ पहुँचे। वे चिल्लाकर कहने लगे, "महाराजऽऽ महाराज अभी भी कम से कम डेढ़ हजार की फौज पीछे से भागती हुई आ रही है। घर के ही किसी व्यक्ति ने धोखा किया है।" "महाराज! बड़ा धोखा है। जल्दी से आगे निकल जाइये।" दूसरे गुप्तचर ने कहा। धनाजी और सन्ताजी राजा के सामने अपने घोड़े चक्राकार घुमा रहे थे। दोनों में से प्रत्येक ने कम से कम पचास मुगलों की जान ली थी। उनके हाथों की नंगी तलवारों से अभी भी खून टपक रहा था। चेहरों पर, कपड़ों पर अभी रक्त दाग दिख रहे थे। खंडो बल्लाल की आँखों में अभी भी रक्त के फौवारे छूट रहे थे। सभी लोगों ने चिल्लाते हुए पूछा, "महाराज आज्ञा। महाराज आज्ञाऽऽ।" शम्भुराजा ने एक क्षण के लिए आँखें मूँद लीं। भगवान का स्मरण किया। उन्होंने कहा, "मित्रो। मैं आपके जोशभरे पौरुष की उमंग समझ सकता हूँ। परन्तु परिस्थिति ने धोखा किया है। अब तलवार से नहीं बुद्धि से लड़ाई लड़नी होगी।" "याने किस तरह?" "यहाँ न रुककर, हमलोग अलग-अलग रास्तों से जाएँगे। सन्ताजी और खंडोबा आप एक भी क्षण अब यहाँ न रुकें। चलिए हवा की गति से आगे बढ़िए। चिपलून की वाशिष्टी नदी के घाट तक कहीं भी न रुकिए। वहाँ अपनी बड़ी चौकी है।" "पर महाराज आपको छोड़कर?" सन्ताजी का स्वर भर्रा गया। "नहीं भाई, अब एक दूसरे की माया में न अटकिये। सन्ताजी और खंडोबा आपलोग चिपलून की ओर भागिए। रास्ते में येसूरानी और अन्य राजपरिवार की स्त्रियों की पालकियाँ मिल जाएँगी। उनकी रक्षा कीजिए। धनाजी आप बचे-खुचे लोगों को लेकर हातखंबा की ओर निकल जाइये। कुछ भला-बुरा प्रसंग आ जाये सम्भाजी :: 659
तो गोवा की ओर के रास्ते को रोककर रखिये।" "और महाराज आप?" धनाजी की-आवाज दयनीय हो गयी। सन्ताजी और खंडो बल्लाल ही नहीं, सभी युवक एक-दूसरे को दुखी होकर देखने लगे। उनकी आँखें भर आयीं। वे घोड़े पर बैठे शम्भू महाराज को ऊपर से नीचे तक देखने लगे। "चलो निकलो, छिटक जाओऽ।" शम्भूराजा ऊँची आवाज में आदेश दे रहे थे। किन्तु युवकों की दृष्टि शम्भूराजा के पैरों से चिपक रही थी। "नहीं महाराज, हम आपको अकेला छोड़कर नहीं जाएँगे।" "तो आपके हठ का विपरीत परिणाम होगा। यदि सभी एक साथ मिलकर जाने की कोशिश करेंगे तो सभी पकड़े जाएँगे। यदि ऐसा हुआ तो अनर्थ हो जाएगा।" "महाराजऽऽ" ऐसा घोष करते हुए सन्ताजी घोड़े पर ही औंधा गये। उन्होंने शम्भूराजा की गोद में सिर रख दिया। महाराज उनके खून से मने चीकट बालों में हाथ फेरने लगे। उसी समय महाराज ने धनाजी और खंडो बल्लाल के कन्धों पर हाथ रखकर थपथपाया। युवकों को धीरज बँधाते हुए महाराज ने कहा, "चलो बच्चो, निकलो, अपनी-अपनी रक्षा स्वयं करो। और साथ ही हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा करो। इसी दक्खिन की मिट्टी में औरंगजेब की कब्र बनानी है।" "पर महाराज आपको छोड़कर?" "अरे किसलिए हमारे प्राणों की इतनी चिन्ता करते हो?" शम्भूराजा की मुद्रा आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भर आयी थी। वे विश्वासपूर्वक गरजे, "माँ के स्तन से दूध पीने वाले बच्चे को अलग करना जिस प्रकार कठिन है उसी प्रकार इस सह्याद्रि की गोद में खेलने वाले इस शम्भू को इससे दूर ले जाना बहुत कठिन है। आपलोग निश्चिन्त होकर आगे जाइये।" चार सम्भाजी और कवि कलश दोनों बड़े वेग से घोड़े दौड़ा रहे थे। पानी और रेत से होकर ये जानवर अपनी जान की बाजी लगाकर भाग रहे थे। कवि कलश के हाथ में असीम वेदना हो रही थी। रक्त बहना बन्द नहीं हो रहा था। अपने प्राणप्रिय राजा को उलझाना भी उचित नहीं लग रहा था। महाराज ने अपने साथ केवल पन्द्रह घुड़सवार लिये थे। उन्हें इस अकल्पनीय संकट से बच निकलना था। शत्रुओं से भरे 660 :: सम्भाजी
इस घने जंगल से जान बचाकर, पहले बाहर निकलना था। कवि कलश घोड़ा दौड़ाते हुए विनती के स्वर में बोले, "राजन आप आगे जाइये, अपनी जान बचाइये, राज्य बचाइये। मेरी चिन्ता न करें। मुझे यहीं पर रुकने दें।" कविराज का काले करौंदे जैसा भरा मुख महाराज ने देखा। परन्तु उस स्थिति में कविराज से निवेदन करते हुए निश्चन्तता से कहा, "नहीं कविराज! यह असम्भव है। 'राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति सः बांधवः।' "जो राजदरबार और श्मशान में साथ देता है वही सच्चा बन्धु होता है। चलिए चिन्ता न कीजिए।" नावड़ी बन्दरगाह से घोड़ा दौड़ाते हुए उन्होंने लगभग दो कोस की दूरी तय की थी। शम्भूराजा ने दाहिनी ओर देखा। सामने झाड़ियों के बीच नदी के किनारे सरदेसाई की कोठी दिखाई दे रही थी। दाहिनी ओर मन्दिर और हरी झाड़ियों में अधछिपे उनके कलश, सब कुछ शान्त लग रहे थे। तट की पथरीली सीढ़ियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे कोई पथिक पानी में पैर लटकाए बैठा हो। महाराज ने घोड़े की लगाम खींचकर उसे रोका और पीठ पीछे शास्त्री नदी के पाट को देखा। नदी तट की रेत धूप में चमचम चमक रही थी। बीच बीच में छोटी-छोटी धाराएँ और रेत दिख रही थी। नावड़ी पर अचानक हुए आक्रमण का यह कस्बे की ओर अधिकांश लोगों को कोई समाचार न था। पीड़ा और खून से बेचैन हाथ को कविराज ने अपने सीने से दबाकर रखा था। शम्भूराजा ने एक क्षण में निर्णय लिया कि मार्ग में अन्यत्र कहीं रुकने की अपेक्षा यहीं पर वेषान्तर और दिशान्तर करना अच्छा है। क्योंकि इस तरह राजसी वस्त्रों और हीरे जवाहरात के आभूषणों के साथ आगे जाना धोखादायक हो सकता था। महाराज ने जल्दी से अपना घोड़ा दाहिनी ओर आड़ में ले लिया। अन्य साथियों ने भी अपने घोड़े आड़ में कर लिए। महाराज ने अपने घोड़े पाखर्या के गले से सारे साज उतार लिए। आगे बढ़ते बढ़ते अपने शरीर से भी सारे आभूषण उतार लिये। उन्हें समेटते हुए वे सरदेसाई की सीढ़ियों पर पहुँच गये। बाहर से अचानक खून सने कपड़ों में शम्भूजी महाराज और कविराज ने प्रवेश किया तो नौकर-चाकरों में खलबली मच गयी। रंगोबा सरदेसाई बाहर दरवाजे पर ही बैठे थे। नाई उनके बाल काट रहा था। खून से सने कपड़ों में राजा को देखकर रंगोबा उठकर खड़े हो गये। घर के अन्य सदस्य-स्त्री-बच्चे भागते हुए बाहर आये। उन्होंने यह अनुमान लगाया कि निश्चित रूप से कुछ धोखा हुआ है, कोई संकट आया है। सम्भाजी :: 661
"महाराज, यह क्या हुआ? ऐसा कैसे हुआ? बताइये मैं क्या करूँ? बताइये महाराज।" सरदेसाई ने घबराकर कहा। "घबराओ नहीं। लेकिन जल्दी करो! कविराज के हाथ की मरहमपट्टी कर दो। हमें आगे जाने की जल्दी है।" शम्भूराजा ने कहा। एक भी क्षण नष्ट किये बिना राजा नाई के सामने बैठ गये। उन्होंने संकेत किया और नाई ने उनके रेशम से मुलायम बालों और नोकदार दाढ़ी को काटना आरम्भ किया। सरदेसाई के नौकरों ने आँगन लगी औषधीय वनस्पति का गूदा निकालकर कविराज के घाव में भरा और फिर चारों ओर कसकर पट्टी बाँध दी। सिर और दाढ़ी को सफाचट कर देने से शम्भूराजा का चेहरा किसी योगी के समान दिखाई दे रहा था। रंगोबा की बूढ़ी माँ कृष्णाबाई दौड़ती हुई बाहर आयी। सभी अनुभव कर रहे थे कि महाराज पर कोई भयानक संकट आ गया है। रंगोबा की माँ सत्तर वर्ष की थीं, पतली, लम्बी, छरहरे शरीर की। उनकी गोरी झुर्रियों से भरी मुखाकृति को देखकर शम्भूराजा को जीजामाता की याद आ गयी। उन्होंने अपने हाथ की मोतियों की माला को उन्हें पहना दिया। कृष्णाबाई ने गदगद होकर राजा को गले से लगा लिया। पूरी कोठी में हाहाकार मच गया था। बाहर नदी के किनारे झाड़ियों में पन्द्रह-सोलह घोड़े खड़े थे। तोप से निकली गोली की तेजी से वे दो कोस तक भागते हुए आये थे। रेती और पत्थरों से होकर भागते हुए उनके घुटने फट गये थे। पाखर्या की नाक से खून बह रहा था। महाराज ने लगाम को इतने जोर से खींचा था कि उसकी नाक रगड़ खा गयी थी। आगे की दौड़ और भी खतरनाक थी। इसके बाद कब और कहाँ रुकना है कुछ निश्चित नहीं था। जितना पी सकते हैं पी लेना चाहिए। आगे की दौड़ के लिए तैयार रहना चाहिए। उन मूक जानवरों ने ऐसा सोचा होगा। पाखर्या ने बड़ी सावधानी से आसपास देखा। आगे-पीछे, इधर उधर कोई जीव जन्तु तक दिखाई न दिया। वह प्यासा घोड़ा थोड़ा आगे सरक गया। धीरे से पानी में अगले दो पैर डालकर, पीठ झुकाकर पानी पीने लगा। उसके साथ अन्य घोड़े भी सरक गये और सामने साफ पानी पीने लगे। पानी पीते पीते कुछ समय बाद पाखर्या को सामने पानी में हिलती-डुलती आकृति दिखाई दी। वह होशियार जानवर घबरा गया। उसने कान खोलकर और गर्दन सीधी करके सामने के तट पर देखा। दूसरे किनारे पर रेती में दबे पैरों से लुकते-छिपते शम्भूराजा की खोज में शत्रु का एक दल आ गया था। सामने की बालू पर अत्यन्त घबराया हुआ गणोजी शिर्के खड़ा था। अपने 'बाप को दिखाओ नहीं तो श्राद्ध करो' ऐसे आवेश में मुकर्रबखान गणोजी को खींचकर वहाँ ले आया था। उसके साथ साठ-सत्तर घुड़सवार तैयार खड़े थे। बगीचे 662 :: सम्भाजी
की लड़ाई में गणोजी ने अपने को पेड़ों की आड़ में छिपा लिया था। परन्तु पहले आक्रमण में थोड़ी-सी तलवारबाजी करके शम्भूराजा निकल गये। उसी समय मुकर्रब ने गणोजी को खींचकर बाहर निकाला। खान की दो हजार की फौज अभी भी संगमेश्वर के मैदान में थी वह अभी तक गाँव तक पहुँची न थी। मुकर्रब को यह भी जानना था कि शम्भूराजा के पास युद्ध के लिए कितनी फौज है? इसलिए सलामी में उसने थोड़ा पीछे हटकर अन्दाजा लिया। पीछे रह गयी फौज का नेतृत्व मुकर्रब का बेटा इखलामखान कर रहा था। अब इखलास अपनी दो हजार फौज के साथ संगमेश्वर पहुँच गया था। कोई शोरगुल या हो-हल्ला किये बिना पिता-पुत्र ने नदी के किनारे से झाड़-झंखाड़ों वनों-जंगलों से अपनी खोज शुरू कर दी थी। बालू में खड़े गणोजी की जली-कटी नजर नदी के दूसरे किनारे पर गयी। उस झाड़ी में चुपचाप चोर की तरह पानी पीते घोड़े, उनके शरीर पर रेशमी वस्त्र, पाखऱ्या के पैरों में घुटनों के ऊपर सोने के चार-चार तोड़े उसे दिखाई पड़े। गणोजी धीरे से किन्तु उत्साहित स्वर में मुकर्रब से बोला, "खान साहब! वह, वह देखिए सम्भा का घोड़ा।" पाखऱ्या ने साँस रोककर अपनी ओर देखते हुए शत्रुओं को देखा। देखते ही वह ईमानदार घोड़ा पीछे मुड़ा और कोठी की ओर तेजी से भागा। वह हिनहिनाते हुए शम्भूराजा को खतरे का संकेत देने लगा। इस समय तक शम्भूराजा ने तैयारी कर ली थी। वे रंगोबा की माँ से विदा ले रहे थे। इसी समय महाराज ने पाखऱ्या का अशुभसूचक हिनहिनाना सुना। उनका कलेजा मुँह को आने लगा। उनकी समझ में आ गया कि निश्चित रूप से कोठी को घेरा जा रहा है। उन्होंने एक क्षण के लिए जीजामाता, शिवाजी महाराज और जगदम्बा का स्मरण किया। यही समय था घने जंगलों से फरार होने का। जंगली पंछी के समान उड़ान भरने का। उन्होंने कवि कलश की ओर देखा उनका हाथ सीने के साथ ठीक से बाँध दिया गया था। फिर भी हाथ से खून टपक रहा था। चेहरे पर असहनीय वेदना झलक रही थी। कविराज ने झट से शम्भूराजा के पैर पकड़ लिये वे रोते कलपते कहने लगे, "राजन आप यहाँ से निकल जाएँ नहीं तो बन्दी बना लिए जाएँगे। कुछ भी करें लेकिन पहले यहाँ से निकल जाएँ।" अब कृतज्ञता के दो आँसू बहाने का भी समय न था। रंगोबा ने समीप रखी तलवार शम्भूराजा के हाथ में पकड़ा दी। कृष्णाबाई ने चावल लेकर राजा की नजर उतारी जिससे उनकी सारी ईड़ा-पीड़ा भाग जाय। 'पाखऱ्या' ऐसी आवाज लगाते हुए शम्भूराजा कोठी से बाहर निकले अपने स्वामी को असुविधा न हो इसलिए वह मूक जानवर अगले पैरों को नीचा किये कोठी के बाहर खड़ा था। राजा ने छलाँग लगाई और लगाम खींचकर सामने देखा। जैसे बाढ़ का पानी अचानक चारों ओर फैल जाये, उसी तरह फौज ने पूरे सम्भाजी 663
इलाके को चारों ओर से घेर लिया था। कोठी के बाहर कर्णेश्वर मन्दिर के सामने वाले शृंगारपुर के रास्ते से, उधर नावड़ी की ओर से, पीछे नदी के किनारे से घोड़े ही घोड़े आ रहे थे। शत्रु संकेत की सीटियाँ बजा रहे थे। पठान, दक्खिनी मुसलमान और गणोजी शिर्के के साथ के सौ-दो सौ मूर्ख ऐसे डेढ़ हजार घुड़सवारों ने कोठी को चारों ओर से घेर लिया था। चारों ओर से भालों, बर्छियों और तलवारों का जंगल खड़ा हो गया था। दुष्ट कालियानाग का मर्दन करने गये कृष्ण को कालिया ने ही दबोच लिया था। दैवगति के सामने सारे मानवीय प्रयत्न निष्फल हो चुके थे। बलिदान की भावना और रणोन्माद की तरंगों से शम्भुराजा का शरीर भभक उठा था। हाथ में नंगी तलवार लिये उन्होंने अपना घोड़ा अपनी जगह पर ही वर्तुलाकार घुमाया। इतनी बड़ी फौज होने पर भी इस बलवान शेर को कैद करने का साहस किसी को नहीं हुआ। दूर से ही रस्सी के फन्दे में फँसाने का प्रयास मुकर्रब कर रहा था। इसी बीच इखलासखान ने पीछे से अपनी तलवार का वार घोड़े के पुट्ठे पर किया। खून की धारा बहने लगी। घोड़ा जोर से हिनहिनाया। विकल होकर पैर पटकने लगा। इतने में साठ-सत्तर पठान एक साथ महाराज पर टूट पड़े। उनमें से एक ने भाले की लाठी का एक जोरदार वार महाराज की जाँघों पर किया। शम्भुराजा असह्य पीड़ा से बेजार हो गये। उनके हाथ से तलवार गिर गयी। वे खाली हाथ खड़े हो गये। शत्रुओं ने मौके का फायदा उठाया। सह्याद्रि का शम्भू महाराज कैद हो गये। यह करुण.दृश्य देखकर कृष्णाबाई ने पत्थर पर अपना सिर पटक दिया। रंगोबा का सिर चकरा गया और वे गिर पड़े। शम्भुराजा को बन्दी बना देखकर भीड़ में खड़ा गणोजी शिर्के आनन्द विह्वल होकर रोने लगा। बीच बीच में आँसू पोंछते हुए वह हँसता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दृश्य सत्य है या झूठ? ऐसे में उसकी स्थिति पागलों जैसी हो रही थी। पिछली तीन रातों से निरन्तर जागती हुई सावधान शत्रु सेना अब 'अल्लाहो अकबर' कहकर किलकारियाँ मारने लगी थी। कुछ सैनिकों ने आसपास इस दृश्य को देखने के लिए एकत्र प्रजा को लाठियों से पीटना शुरू किया। बगल के घरों और सरदेसाई की कोठी को आग लगा दी। शत्रु सेना भी इस बात के लिए सम्भ्रमित हो गयी थी कि इस अचानक प्राप्त सम्पदा का क्या करें? शम्भुराजा और कविराज पर कम्बल उड़ाया गया। पकड़े गये चोरों की तरह उन्हें गाँव से दो कोस के फासले पर ले जाया गया। बायें हाथ पर वरुणा नदी का पाट था। वहीं नदी के किनारे मुकर्रबखान रुका। वहाँ निर्णय लिया गया कि मुकर्रब अपने साथ केवल छह-सात सौ घुड़सवारों को लेगा। शेष थके हुए 664 :: सम्भाजी
घोड़ों और घुड़सवारों तथा गणोजी के दो सौ साथियों को पीछे रखा जाएगा। वे वहीं से पहरा देंगे। यदि पीछे से आक्रमण हुआ तो वे उसे रोकेंगे। मुकर्रब ने अपने सहयोगियों को आदेश दिया, 'जो कुछ भी खाने के लिए है उसे शीघ्रता से समाप्त कीजिए।' उनके थैलों में जो खाद्य सामग्री बची थी उसे सिपाहियों ने खड़े-खड़े ही खा लिया। बगल की नदी में घोड़ों ने पानी पिया। सैनिक और घोड़े तैयार हो गये। शम्भूराजा और कवि कलश अवाक् हो गये थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे स्वप्न की स्थिति में हैं या यथार्थ की। इखलासखान ने आगे बढ़कर हाथ- पाँव बँधे शम्भूराजा और कवि कलश के मुँह पर तमाचा मारा। शम्भूराजा को तमाचा लगाने से पहले ही कवि कलश ने इखलासखान के मुख पर जोर से थूक दिया। इस पर अपनी कमर पर बँधा चाबुक इखलास ने बाहर निकाल लिया। उसने शम्भूराजा और कवि कलश के सिर पर, गालों पर वार किया। मुड़े हुए उनके सिरों और गालों पर काले-नीले निशान उभर आये। दोनों को घोड़ों पर बाँधा गया। उनके शरीर के राजसी कपड़े फाड़ दिये गये। उनकी जगह उन्हें हरे रग के मुसलमानी ढंग के कपड़े पहनाये गये। नुकीली दाढ़ी, कन्धे पर लहराते लम्बे मुलायम रेशमी बाल साफ हो गये थे। मुंड़ा हुआ सिर और उस पर घावों के निशान, शरीर पर हरे कुर्ते। इस वेषान्तर से शम्भूराजा और कविराज दोनों ही एकदम अलग दिख रहे थे। उन्हें सही रूप में पहचान पाना किसी के भी लिए असम्भव था। शम्भूराजा के इस परिवर्तित रूप को देखकर गणोजी पेट पकड़कर जोर-जोर से हँसा। वह ईर्ष्या भाव से बोला, "वाह-वाह रायगढ़ के शम्भू महाराज!" मुकर्रबखान अपनी कड़क आवाज में गणोजी को डाँटते हुए बोला, "गणोजी, पागल, यह हँसी-मजाक करने का समय नहीं है। आगे का रास्ता दिखाओ।" आसपास के पर्वत और गहरी घाटियों को देखकर वह घबरा गया था। उसने घबराहट भरे स्वर में कहा, "खान साहब वह दूरी पर दिखाई देने वाले पर्वत की चोटी को दिन के उजाले में पार किया तो अच्छा होगा। नहीं तो मधुमक्खियों के छत्ते फूटने की तरह मराठे हमारी दुर्गति कर देंगे।" "किन्तु गणोजी! खुदा की खैर से मिला यह शिकार आसानी से पचने वाला नहीं है। कुछ भी करो! अधिक रात होने से पहले हमें कराड़ के अपने मुगली क्षेत्र में पहुँचना है।" "चिन्ता क्यों करते हैं, मुकर्रब मियाँ? कराड़ का रास्ता हमारे श्रृंगार के क्षेत्र से ही होकर जाता है। यह तो हमारा ही क्षेत्र है।" बिना एक क्षण भी कहीं रुके, आठ नौ सौ चुस्त दुरुस्त घोड़े मार्ग पर बढ़ने
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लगे। नायरी के पास शास्त्री नदी पर एक लकड़ी का पुल था। इसे शम्भूराजा ने बनवाया था। नदी को पार करके घोड़े तेज गति से दौड़ने लगे। शम्भूराजा की दुखी दृष्टि शास्त्री नदी का प्रवाह देखने लगी। यह धारा उनकी प्यारी रानी येसू के मायके शृंगारपुर से नीचे की ओर आ रही थी। उनका स्मरण आते ही अनायास आँखों से आँसू की चार बूँदें टपक पड़ीं। अब ससुराल, स्वराज्य, सौख्य के रास्ते, सुख के अनुभव, मित्रों के स्थान, मन्दिर, पानी से भरे घाट आदि एक-एक करके पीछे छूट रहे थे। सामने का छाती तक ऊँची घासों और कँटीली झाड़ियों से भरा रास्ता कट नहीं रहा था। निवली के मैदान पर गड़ेरियों के आठ स्वस्थ तरुण लड़के खड़े थे। सिर पर लाल भड़क या नीली पगड़ी बाँधे, हाथ में लाठियाँ और कमर में दो दिनों के लिए रोटियाँ बँधी थीं। जंगल घासों के बीच लुप्त हुए रास्ते की ओर वे देख रहे थे। ऐसी सूचना दी गयी थी कि दिन कभी भी मेहमान आ सकते हैं। इसलिए आठ-नौ सौ लोगों के लिए रोटियाँ बनाकर तैयार रखें। पिछले दो दिनों से रोज इतने लोगों के लिए रोटियाँ बनाकर निवली के पास गड़ेरिये खड़े रहते थे। दो दिन पूर्व गणोजी शिर्के का कर्मचारी गोवर्धन पन्त स्वयं निवली आ गया था। गोवर्धन पन्त ने वहाँ लोगों को बताया था कि जयनगर बन्दरगाह के पास कुछ ईरानी चोरी से हीरे की तस्करी करते हैं। उन्हें पकड़ने के लिए शिर्के की एक सेना वहाँ तैनात है। उन परदेशी व्यापारियों को पकड़कर कराड़ के रास्ते सतारा ले जाने के लिए शम्भू महाराज ने आदेश दिया है। इस बहाने से शिर्के और शम्भू महाराज की अनबन समाप्त हो गयी है, ऐसा स्थानीय लोगों ने अनुभव किया था। लोग आपस में तालियाँ बजाकर कह रहे थे, 'अन्त में पत्नी का भाई साला, मीठे सम्बन्धों में आला।' गोवर्धन पन्त एक कंजूस व्यक्ति के रूप में पूरे इलाके में विख्यात थे। किन्तु इस समय वह बहुत उदार हो गया था। रोटी बनाने वाली गड़ेरियों की स्त्रियों को उसने अँजुरी-अँजुरी भर रुपये बाँटे। किसी ने उनसे विनोद में पूछ भी लिया था, “सरकार! रोटियाँ दो-तीन दिनों के लिए चाहिए या एक महीने के लिए? इसी बीच गोवर्धन पन्त ने कहीं से दो सौ हृष्ट-पुष्ट घोड़े भी पैदा कर लिए थे। उन्हें निवली झरने के समीप पेड़ों की आड़ में बाँध दिया गया था। इसी से गाँव वालों ने अनुमान लगा लिया था कि शिकार कोई बड़ा ही होने वाला था। गड़ेरियों के आठ हृष्ट-पुष्ट युवकों को रहबर के रूप में चुन लिया गया था। घाट का वह जंगली रास्ता बहुत कठिन था। उसमें अनेक खतरे थे। कम से कम आठ-दस हट्टे-कट्टे लोगों के साथ होने पर ही कोई उस जंगल में प्रवेश करने का साहस करता था। शेरों की गर्जनाएँ और जंगली सुअरों की गुर्राहटें आसपास सुनते 666 :: सम्भाजी
हुए ही घाट चढ़ना पड़ता था। कभी कभी ही कुछ व्यापारी हजार-पाँच सौ बैलों की पीठ पर सामान लादकर इस घाट से ऊपर चढ़कर दूसरी ओर पाटण या कराड़ की ओर चले जाते थे। इस रास्ते से परिचित होने पर भी व्यापारी निवली या नेदरवाड़ी के युवकों को राह दिखाने के लिए अपने साथ ले जाते थे। उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ते थे। कल से लोग राह देखते बैठे थे। स्त्रियाँ टोकरी टोकरी भर रोटियाँ बनाकर मेहमानों की प्रतीक्षा कर रही थीं। बैठे-बैठे लड़कों का हँसी-मजाक भी चालू था। किमी ने मजाक में पूछा, "गोवर्धन पन्त कभी इस घाट पर चढ़े हैं क्या?" इस पर दूसरा युवक हँसते-हँसते बोल पड़ा, "पन्त की बात तो छोड़ो, गणोजी शिर्के के बाप-दादाओं तक ने यह घाट कभी देखा नहीं है।" दोपहर की धूप तमतमाने लगी। इसी समय ऊँची घासों और घने पेड़ों के बीच से आठ-नौ सौ घोड़े एक साथ बाहर निकले। सामने की चढ़ाई के कारण सभी पसीने से तर हो चुके थे। गोवर्धन पन्त ने शीघ्रता से झरने के पास बँधे दो सौ घोड़ों का काफिला बाहर निकाला। मुसलमान सैनिक अपने अपने घोड़ों से छलाँग लगाकर नीचे उतरे। गड़ेरियों की स्त्रियों ने रोटियों की टोकरियाँ आगे कर दीं। थके-हारे सैनिकों ने चटनी के साथ रोटियाँ खड़े-खड़े ही निगल लीं। जिनके घोड़े थक गये थे, जख्मी हो गये थे या तीन-चार दिन की लगातार दौड़ के कारण अशक्त हो गये थे उन्हें बदलकर पन्त ने नये घोड़ों की लगाम सैनिकों को पकड़ाई। राह दिखाने वाले लड़कों की आँखें सौदागरों को ढूँढ़ रही थीं। दोनों सौदागर उन्हें दिखाई पड़े। चौड़ी पीठ वाले ऊँचे घोड़ों पर उन्हें जकड़ दिया गया था। दोनों का चेहरा पिटाई और सूजन से मनहूस दिखाई पड़ रहा था। उनके हाथ पीठ पर कसकर बाँध दिए गये थे। साथ वे रो या चिल्ला न सकें, इसलिए उनके मुँह मे कपड़ा ठूँसकर एक पट्टी कान के पीछे बाँध दी गयी थी। यह वही ढंग था जैसे घोड़ों के मुँह में नकाब बाँधी जाती है। गड़ेरियों के लड़के बड़े कुतूहल से उनकी आँखों को देख रहे थे। वे आपस में बात कर रहे थे, 'शिरपा भाई! इन दोनों की आँखें तो हीरों से भी अधिक चमक रही हैं। इन दोनों की आँखों से रह रहकर आँसू भी टपक रहे थे। उद्वेग से, ग्लानि से उनकी आँखें जल भी रही थीं और सूख भी रही थीं।' थोड़ा विश्राम मिलते न मिलते, घोड़े पर बैठा गणोजी शिर्के चिल्लाया, "खान साहब जल्दी चलिए, उठिए नहीं तो मेरा गला कट जाएगा। मुकर्रब और इखलासखान दोनों बाप-बेटे हँस पड़े। उन्हें भी जाने की बहुत जल्दी थी। देखते देखते घोड़े निवली का जंगल पीछे छोड़कर नेदरवाड़ी की दिशा में दौड़ने लगे। गणोजी की तरह ही मुकर्रबखान भी डर रहा था। ऐसा भयानक जंगल उसने सम्भाजी . 667
इससे पहले कभी नहीं देखा था। कमर भर ऊँची घास जब हवा के झोंकों के साथ सरसराकर लहराती तो हाथियों के लोटने का आभास होता। बायीं ओर की पहाड़ी पर श्रृंगारपुर का वनप्रदेश था। उधर के खड़ी चट्टानों वाले पहाड़ों और घने जंगलों को देखकर मुकर्रब को पसीना छूट रहा था। अचानक दूर से घोड़ों के पैरों की आवाज आने लगी। देखते-देखते सामने की घासों के बीच से पचास-साठ घोड़ों का जत्था दौड़ता हुआ सामने आ गया। यह देखकर मुकर्रब हक्का-बक्का रह गया। इखलासखान भी चौंक गया। कहाँ से आ गयी यह मराठों की सेना ? पीछे जाने और कितने छिपे हैं? बाप-बेटे घबरायी हुई नजरों से एक-दूसरे को देखने लगे। उन्हें लगा जैसे पूरा जंगल ही घोड़ों से घिरा है। मराठों की सेना द्वारा रास्ता रोक दिए जाने पर खान की सेना घबरा गयी। वह अपनी ही जगह ठहर गयी। घोड़ों के साथ घोड़े सिमटने लगे। वे अपने शरीर को सिकोड़कर खड़े हो गये। मुकर्रब की आँखें डरकर सफेद पड़ गयीं। गणोजी ने सामने सूर्याजी भोसले को देखा। उसने पहचान लिया कि यह श्रृंगारपुर की गश्ती सेना है। अपने साथ की सेना में पन्द्रह-बीस मराठों को देखकर, गणोजी ने उन्हें संकेत किया। गणोजी ने जोर से नारा लगाया, 'सम्भाजी महाराज की जयऽऽ !' यह नारा सुनकर सूर्याजी अपना घोड़ा लेकर आगे आ गये। उसने गणोजी को पहचाना। उसने पूछा, "क्यों गणोजी यहाँ कहाँ?" "बस यहीं, यहीं चला हूँ उंब्रज की ओर।" "अरे लेकिन आप यहाँ कैसे ? और ये लोग आपके साथ कौन हैं? मैंने तो सुना था कि आप मुगलों के पास गये थे।" गणोजी अपना घोड़ा बढ़ाकर सूर्याजी के पास आ गये। उनके कन्धे को थपथपाते हुए बोले, "अरे सूर्याजी, खून के रिश्ते भी क्या कभी इतने कच्चे होते हैं ? क्यों? बीच-बीच में कभी हो जाती नोक झोंक। किन्तु सगी बहन के महारानी होने पर भी हम मुगलों के पास जाने की हरामखोरी क्यों करेंगे ?" "ठीक है, घोड़े पर लाद फाँदकर किसे ले जा रहे हो ? "ये ? क्या है कि ईरानी सौदागर हैं दोनों। जयनगर बन्दरगाह के समीप ये दोनों हरामखोर पकड़े गये। हीरों और अन्य रत्नों की तस्करी करते थे। इन मक्कारों को ले जाकर हाजिर करेंगे शम्भू महाराज के सामने।" गणोजी ने कहा। "यदि ऐसी बात है तो रुकिए नहीं, जल्दी ही निकलिए। दिन के उजाले में पहाड़ उतर जाइये। यह रास्ता बहुत कठिन है।" सूर्याजी की सेना पीछे छूट गयी। घोड़े फिर से दौड़ने लगे। जंगल की बहुत-सी पगडंडियाँ निकलती गयीं। मालेघाट समीप आ गया 668 :: सम्भाजी
इस घाट की चढ़ाई जैसे ही आरम्भ हुई, मुकर्रब की फौज को नानी याद आने लगी। शम्भूराजा और कविराज को छोड़कर शेष सभी लोग घोड़ों से उतर गये। करौंदे की कँटीली झाड़ियाँ, पैरों तले ऊबड़-खाबड़ जमीन, रास्ते के टूटे-फूटे पत्थर, बारिस के पानी से जगह-जगह बने गड्ढे इतने कष्टकर थे कि घोड़ों और पैदल चल रहे सवारों को रोना आ गया। बहुतों के पैरों में मोच आ गयी। ठोकर लगने से कुछ की उँगलियाँ फट गयीं। उस सँकरी राह से चलते हुए घोड़े अनेक बार झुक जाते थे। उन्होंने लीद की और मूतने लगे। घंटे-डेढ़ घंटे बीत गये किन्तु चढ़ाई समाप्त नहीं हो रही थी। पल-पल और कण-कण अपना प्रदेश पीछे छूटता गया। सारा शरीर रस्सी और जंजीरों से बँधा हुआ था। मुँह में लगाम की तरह कपड़ा ठूँसा हुआ था। केवल आँखें खुली थीं। शम्भूराजा क्या और कैसे बोलते ? शरीर पर कोई चट्टान अचानक टूट पड़े, अचानक कोई आक्रमण हो जाये और बुद्धि हतप्रभ हो जाये तो बोलने वाला बोले भी क्या ? पिछले चार दिनों से निरन्तर जागते हुए मुकर्रब के सिपाही तंग आ गये थे। यदि गणोजी शिर्के ने घोड़ों के बदलने और रास्ते में स्थान-स्थान पर खाने-पीने की व्यवस्था न की होती तो इस भयानक जंगल ने मुकर्रब की फौज को कब का लील लिया होता। सह्याद्रि की इन कँटीली झाड़ियों से भरी पहाड़ियों में उन्हें रास्ता ही न मिल पाता। फौजी और जानवर भूख से तड़पकर कब के मर गये होते। तीन सौ साल पहले जैसे मलिक उत्तुजार की सात हजार की सेना को इसी विषैले जंगल ने समाप्त कर दिया था, वैसे मुकर्रब की फौज भी ममाप्त हो जाती। इस भयानक मालेघाट की चढ़ाई में मुकर्रब के साथ कुछ ऐसे अनुभवी सिपाही थे जिन्होंने शहजादे आज़म के साथ शमदरी की कुख्यात चढ़ाई देखी थी। उनके पैजामों को भय से गीले हो जाने का समय आ गया था। लोगों को शका होने लगी कि इस रास्ते से ले जाने में गणोजी का कोई षड्यन्त्र न हो? लोग गणोजी की ओर शंका से देखने लगे। मुकर्रब स्वयं मजबूत कद काठी का व्यक्ति था किन्तु उसके पैरों में दो बार मोच आ चुकी थी। पैरों की नसों और मांस में भयानक पीड़ा होने लगी। भयानक पीड़ा से वह विकल हो गया। उसने गणोजी से क्रोध में पूछा, "गणोजी, ठीक-ठीक बताओ यह राह कहाँ जा रही है? कराड़ को या जहन्नम में?" "थोड़ा धीरज रखिए खान साहब! सिर्फ इसी रास्ते से आप शाम तक कराड़ पहुँच सकते हैं। दूसरे किसी रास्ते से हम निकलते तो मराठी सेना सचमुच हमें जहन्नम ही भेज देती। शिवाजी और सम्भाजी इस इलाके में भगवानस्वरूप हैं।" उतावले होकर बौखलाये सिपाहियों और उनके बेदम हुए घोड़ों को देखकर सम्भाजी :: 669