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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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घोड़ों और घुड़सवारों तथा गणोजी के दो सौ साथियों को पीछे रखा जाएगा। वे वहीं से पहरा देंगे। यदि पीछे से आक्रमण हुआ तो वे उसे रोकेंगे। मुकर्रब ने अपने सहयोगियों को आदेश दिया, 'जो कुछ भी खाने के लिए है उसे शीघ्रता से समाप्त कीजिए।' उनके थैलों में जो खाद्य सामग्री बची थी उसे सिपाहियों ने खड़े-खड़े ही खा लिया। बगल की नदी में घोड़ों ने पानी पिया। सैनिक और घोड़े तैयार हो गये। शम्भूराजा और कवि कलश अवाक् हो गये थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे स्वप्न की स्थिति में हैं या यथार्थ की। इखलासखान ने आगे बढ़कर हाथ- पाँव बँधे शम्भूराजा और कवि कलश के मुँह पर तमाचा मारा। शम्भूराजा को तमाचा लगाने से पहले ही कवि कलश ने इखलासखान के मुख पर जोर से थूक दिया। इस पर अपनी कमर पर बँधा चाबुक इखलास ने बाहर निकाल लिया। उसने शम्भूराजा और कवि कलश के सिर पर, गालों पर वार किया। मुड़े हुए उनके सिरों और गालों पर काले-नीले निशान उभर आये। दोनों को घोड़ों पर बाँधा गया। उनके शरीर के राजसी कपड़े फाड़ दिये गये। उनकी जगह उन्हें हरे रग के मुसलमानी ढंग के कपड़े पहनाये गये। नुकीली दाढ़ी, कन्धे पर लहराते लम्बे मुलायम रेशमी बाल साफ हो गये थे। मुंड़ा हुआ सिर और उस पर घावों के निशान, शरीर पर हरे कुर्ते। इस वेषान्तर से शम्भूराजा और कविराज दोनों ही एकदम अलग दिख रहे थे। उन्हें सही रूप में पहचान पाना किसी के भी लिए असम्भव था। शम्भूराजा के इस परिवर्तित रूप को देखकर गणोजी पेट पकड़कर जोर-जोर से हँसा। वह ईर्ष्या भाव से बोला, "वाह-वाह रायगढ़ के शम्भू महाराज!" मुकर्रबखान अपनी कड़क आवाज में गणोजी को डाँटते हुए बोला, "गणोजी, पागल, यह हँसी-मजाक करने का समय नहीं है। आगे का रास्ता दिखाओ।" आसपास के पर्वत और गहरी घाटियों को देखकर वह घबरा गया था। उसने घबराहट भरे स्वर में कहा, "खान साहब वह दूरी पर दिखाई देने वाले पर्वत की चोटी को दिन के उजाले में पार किया तो अच्छा होगा। नहीं तो मधुमक्खियों के छत्ते फूटने की तरह मराठे हमारी दुर्गति कर देंगे।" "किन्तु गणोजी! खुदा की खैर से मिला यह शिकार आसानी से पचने वाला नहीं है। कुछ भी करो! अधिक रात होने से पहले हमें कराड़ के अपने मुगली क्षेत्र में पहुँचना है।" "चिन्ता क्यों करते हैं, मुकर्रब मियाँ? कराड़ का रास्ता हमारे श्रृंगार के क्षेत्र से ही होकर जाता है। यह तो हमारा ही क्षेत्र है।" बिना एक क्षण भी कहीं रुके, आठ नौ सौ चुस्त दुरुस्त घोड़े मार्ग पर बढ़ने

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