छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 668, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगे। नायरी के पास शास्त्री नदी पर एक लकड़ी का पुल था। इसे शम्भूराजा ने बनवाया था। नदी को पार करके घोड़े तेज गति से दौड़ने लगे। शम्भूराजा की दुखी दृष्टि शास्त्री नदी का प्रवाह देखने लगी। यह धारा उनकी प्यारी रानी येसू के मायके शृंगारपुर से नीचे की ओर आ रही थी। उनका स्मरण आते ही अनायास आँखों से आँसू की चार बूँदें टपक पड़ीं। अब ससुराल, स्वराज्य, सौख्य के रास्ते, सुख के अनुभव, मित्रों के स्थान, मन्दिर, पानी से भरे घाट आदि एक-एक करके पीछे छूट रहे थे। सामने का छाती तक ऊँची घासों और कँटीली झाड़ियों से भरा रास्ता कट नहीं रहा था। निवली के मैदान पर गड़ेरियों के आठ स्वस्थ तरुण लड़के खड़े थे। सिर पर लाल भड़क या नीली पगड़ी बाँधे, हाथ में लाठियाँ और कमर में दो दिनों के लिए रोटियाँ बँधी थीं। जंगल घासों के बीच लुप्त हुए रास्ते की ओर वे देख रहे थे। ऐसी सूचना दी गयी थी कि दिन कभी भी मेहमान आ सकते हैं। इसलिए आठ-नौ सौ लोगों के लिए रोटियाँ बनाकर तैयार रखें। पिछले दो दिनों से रोज इतने लोगों के लिए रोटियाँ बनाकर निवली के पास गड़ेरिये खड़े रहते थे। दो दिन पूर्व गणोजी शिर्के का कर्मचारी गोवर्धन पन्त स्वयं निवली आ गया था। गोवर्धन पन्त ने वहाँ लोगों को बताया था कि जयनगर बन्दरगाह के पास कुछ ईरानी चोरी से हीरे की तस्करी करते हैं। उन्हें पकड़ने के लिए शिर्के की एक सेना वहाँ तैनात है। उन परदेशी व्यापारियों को पकड़कर कराड़ के रास्ते सतारा ले जाने के लिए शम्भू महाराज ने आदेश दिया है। इस बहाने से शिर्के और शम्भू महाराज की अनबन समाप्त हो गयी है, ऐसा स्थानीय लोगों ने अनुभव किया था। लोग आपस में तालियाँ बजाकर कह रहे थे, 'अन्त में पत्नी का भाई साला, मीठे सम्बन्धों में आला।' गोवर्धन पन्त एक कंजूस व्यक्ति के रूप में पूरे इलाके में विख्यात थे। किन्तु इस समय वह बहुत उदार हो गया था। रोटी बनाने वाली गड़ेरियों की स्त्रियों को उसने अँजुरी-अँजुरी भर रुपये बाँटे। किसी ने उनसे विनोद में पूछ भी लिया था, “सरकार! रोटियाँ दो-तीन दिनों के लिए चाहिए या एक महीने के लिए? इसी बीच गोवर्धन पन्त ने कहीं से दो सौ हृष्ट-पुष्ट घोड़े भी पैदा कर लिए थे। उन्हें निवली झरने के समीप पेड़ों की आड़ में बाँध दिया गया था। इसी से गाँव वालों ने अनुमान लगा लिया था कि शिकार कोई बड़ा ही होने वाला था। गड़ेरियों के आठ हृष्ट-पुष्ट युवकों को रहबर के रूप में चुन लिया गया था। घाट का वह जंगली रास्ता बहुत कठिन था। उसमें अनेक खतरे थे। कम से कम आठ-दस हट्टे-कट्टे लोगों के साथ होने पर ही कोई उस जंगल में प्रवेश करने का साहस करता था। शेरों की गर्जनाएँ और जंगली सुअरों की गुर्राहटें आसपास सुनते 666 :: सम्भाजी