भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 669

हुए ही घाट चढ़ना पड़ता था। कभी कभी ही कुछ व्यापारी हजार-पाँच सौ बैलों की पीठ पर सामान लादकर इस घाट से ऊपर चढ़कर दूसरी ओर पाटण या कराड़ की ओर चले जाते थे। इस रास्ते से परिचित होने पर भी व्यापारी निवली या नेदरवाड़ी के युवकों को राह दिखाने के लिए अपने साथ ले जाते थे। उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ते थे। कल से लोग राह देखते बैठे थे। स्त्रियाँ टोकरी टोकरी भर रोटियाँ बनाकर मेहमानों की प्रतीक्षा कर रही थीं। बैठे-बैठे लड़कों का हँसी-मजाक भी चालू था। किमी ने मजाक में पूछा, "गोवर्धन पन्त कभी इस घाट पर चढ़े हैं क्या?" इस पर दूसरा युवक हँसते-हँसते बोल पड़ा, "पन्त की बात तो छोड़ो, गणोजी शिर्के के बाप-दादाओं तक ने यह घाट कभी देखा नहीं है।" दोपहर की धूप तमतमाने लगी। इसी समय ऊँची घासों और घने पेड़ों के बीच से आठ-नौ सौ घोड़े एक साथ बाहर निकले। सामने की चढ़ाई के कारण सभी पसीने से तर हो चुके थे। गोवर्धन पन्त ने शीघ्रता से झरने के पास बँधे दो सौ घोड़ों का काफिला बाहर निकाला। मुसलमान सैनिक अपने अपने घोड़ों से छलाँग लगाकर नीचे उतरे। गड़ेरियों की स्त्रियों ने रोटियों की टोकरियाँ आगे कर दीं। थके-हारे सैनिकों ने चटनी के साथ रोटियाँ खड़े-खड़े ही निगल लीं। जिनके घोड़े थक गये थे, जख्मी हो गये थे या तीन-चार दिन की लगातार दौड़ के कारण अशक्त हो गये थे उन्हें बदलकर पन्त ने नये घोड़ों की लगाम सैनिकों को पकड़ाई। राह दिखाने वाले लड़कों की आँखें सौदागरों को ढूँढ़ रही थीं। दोनों सौदागर उन्हें दिखाई पड़े। चौड़ी पीठ वाले ऊँचे घोड़ों पर उन्हें जकड़ दिया गया था। दोनों का चेहरा पिटाई और सूजन से मनहूस दिखाई पड़ रहा था। उनके हाथ पीठ पर कसकर बाँध दिए गये थे। साथ वे रो या चिल्ला न सकें, इसलिए उनके मुँह मे कपड़ा ठूँसकर एक पट्टी कान के पीछे बाँध दी गयी थी। यह वही ढंग था जैसे घोड़ों के मुँह में नकाब बाँधी जाती है। गड़ेरियों के लड़के बड़े कुतूहल से उनकी आँखों को देख रहे थे। वे आपस में बात कर रहे थे, 'शिरपा भाई! इन दोनों की आँखें तो हीरों से भी अधिक चमक रही हैं। इन दोनों की आँखों से रह रहकर आँसू भी टपक रहे थे। उद्वेग से, ग्लानि से उनकी आँखें जल भी रही थीं और सूख भी रही थीं।' थोड़ा विश्राम मिलते न मिलते, घोड़े पर बैठा गणोजी शिर्के चिल्लाया, "खान साहब जल्दी चलिए, उठिए नहीं तो मेरा गला कट जाएगा। मुकर्रब और इखलासखान दोनों बाप-बेटे हँस पड़े। उन्हें भी जाने की बहुत जल्दी थी। देखते देखते घोड़े निवली का जंगल पीछे छोड़कर नेदरवाड़ी की दिशा में दौड़ने लगे। गणोजी की तरह ही मुकर्रबखान भी डर रहा था। ऐसा भयानक जंगल उसने सम्भाजी . 667