छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 670, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंइससे पहले कभी नहीं देखा था। कमर भर ऊँची घास जब हवा के झोंकों के साथ सरसराकर लहराती तो हाथियों के लोटने का आभास होता। बायीं ओर की पहाड़ी पर श्रृंगारपुर का वनप्रदेश था। उधर के खड़ी चट्टानों वाले पहाड़ों और घने जंगलों को देखकर मुकर्रब को पसीना छूट रहा था। अचानक दूर से घोड़ों के पैरों की आवाज आने लगी। देखते-देखते सामने की घासों के बीच से पचास-साठ घोड़ों का जत्था दौड़ता हुआ सामने आ गया। यह देखकर मुकर्रब हक्का-बक्का रह गया। इखलासखान भी चौंक गया। कहाँ से आ गयी यह मराठों की सेना ? पीछे जाने और कितने छिपे हैं? बाप-बेटे घबरायी हुई नजरों से एक-दूसरे को देखने लगे। उन्हें लगा जैसे पूरा जंगल ही घोड़ों से घिरा है। मराठों की सेना द्वारा रास्ता रोक दिए जाने पर खान की सेना घबरा गयी। वह अपनी ही जगह ठहर गयी। घोड़ों के साथ घोड़े सिमटने लगे। वे अपने शरीर को सिकोड़कर खड़े हो गये। मुकर्रब की आँखें डरकर सफेद पड़ गयीं। गणोजी ने सामने सूर्याजी भोसले को देखा। उसने पहचान लिया कि यह श्रृंगारपुर की गश्ती सेना है। अपने साथ की सेना में पन्द्रह-बीस मराठों को देखकर, गणोजी ने उन्हें संकेत किया। गणोजी ने जोर से नारा लगाया, 'सम्भाजी महाराज की जयऽऽ !' यह नारा सुनकर सूर्याजी अपना घोड़ा लेकर आगे आ गये। उसने गणोजी को पहचाना। उसने पूछा, "क्यों गणोजी यहाँ कहाँ?" "बस यहीं, यहीं चला हूँ उंब्रज की ओर।" "अरे लेकिन आप यहाँ कैसे ? और ये लोग आपके साथ कौन हैं? मैंने तो सुना था कि आप मुगलों के पास गये थे।" गणोजी अपना घोड़ा बढ़ाकर सूर्याजी के पास आ गये। उनके कन्धे को थपथपाते हुए बोले, "अरे सूर्याजी, खून के रिश्ते भी क्या कभी इतने कच्चे होते हैं ? क्यों? बीच-बीच में कभी हो जाती नोक झोंक। किन्तु सगी बहन के महारानी होने पर भी हम मुगलों के पास जाने की हरामखोरी क्यों करेंगे ?" "ठीक है, घोड़े पर लाद फाँदकर किसे ले जा रहे हो ? "ये ? क्या है कि ईरानी सौदागर हैं दोनों। जयनगर बन्दरगाह के समीप ये दोनों हरामखोर पकड़े गये। हीरों और अन्य रत्नों की तस्करी करते थे। इन मक्कारों को ले जाकर हाजिर करेंगे शम्भू महाराज के सामने।" गणोजी ने कहा। "यदि ऐसी बात है तो रुकिए नहीं, जल्दी ही निकलिए। दिन के उजाले में पहाड़ उतर जाइये। यह रास्ता बहुत कठिन है।" सूर्याजी की सेना पीछे छूट गयी। घोड़े फिर से दौड़ने लगे। जंगल की बहुत-सी पगडंडियाँ निकलती गयीं। मालेघाट समीप आ गया 668 :: सम्भाजी