छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस घाट की चढ़ाई जैसे ही आरम्भ हुई, मुकर्रब की फौज को नानी याद आने लगी। शम्भूराजा और कविराज को छोड़कर शेष सभी लोग घोड़ों से उतर गये। करौंदे की कँटीली झाड़ियाँ, पैरों तले ऊबड़-खाबड़ जमीन, रास्ते के टूटे-फूटे पत्थर, बारिस के पानी से जगह-जगह बने गड्ढे इतने कष्टकर थे कि घोड़ों और पैदल चल रहे सवारों को रोना आ गया। बहुतों के पैरों में मोच आ गयी। ठोकर लगने से कुछ की उँगलियाँ फट गयीं। उस सँकरी राह से चलते हुए घोड़े अनेक बार झुक जाते थे। उन्होंने लीद की और मूतने लगे। घंटे-डेढ़ घंटे बीत गये किन्तु चढ़ाई समाप्त नहीं हो रही थी। पल-पल और कण-कण अपना प्रदेश पीछे छूटता गया। सारा शरीर रस्सी और जंजीरों से बँधा हुआ था। मुँह में लगाम की तरह कपड़ा ठूँसा हुआ था। केवल आँखें खुली थीं। शम्भूराजा क्या और कैसे बोलते ? शरीर पर कोई चट्टान अचानक टूट पड़े, अचानक कोई आक्रमण हो जाये और बुद्धि हतप्रभ हो जाये तो बोलने वाला बोले भी क्या ? पिछले चार दिनों से निरन्तर जागते हुए मुकर्रब के सिपाही तंग आ गये थे। यदि गणोजी शिर्के ने घोड़ों के बदलने और रास्ते में स्थान-स्थान पर खाने-पीने की व्यवस्था न की होती तो इस भयानक जंगल ने मुकर्रब की फौज को कब का लील लिया होता। सह्याद्रि की इन कँटीली झाड़ियों से भरी पहाड़ियों में उन्हें रास्ता ही न मिल पाता। फौजी और जानवर भूख से तड़पकर कब के मर गये होते। तीन सौ साल पहले जैसे मलिक उत्तुजार की सात हजार की सेना को इसी विषैले जंगल ने समाप्त कर दिया था, वैसे मुकर्रब की फौज भी ममाप्त हो जाती। इस भयानक मालेघाट की चढ़ाई में मुकर्रब के साथ कुछ ऐसे अनुभवी सिपाही थे जिन्होंने शहजादे आज़म के साथ शमदरी की कुख्यात चढ़ाई देखी थी। उनके पैजामों को भय से गीले हो जाने का समय आ गया था। लोगों को शका होने लगी कि इस रास्ते से ले जाने में गणोजी का कोई षड्यन्त्र न हो? लोग गणोजी की ओर शंका से देखने लगे। मुकर्रब स्वयं मजबूत कद काठी का व्यक्ति था किन्तु उसके पैरों में दो बार मोच आ चुकी थी। पैरों की नसों और मांस में भयानक पीड़ा होने लगी। भयानक पीड़ा से वह विकल हो गया। उसने गणोजी से क्रोध में पूछा, "गणोजी, ठीक-ठीक बताओ यह राह कहाँ जा रही है? कराड़ को या जहन्नम में?" "थोड़ा धीरज रखिए खान साहब! सिर्फ इसी रास्ते से आप शाम तक कराड़ पहुँच सकते हैं। दूसरे किसी रास्ते से हम निकलते तो मराठी सेना सचमुच हमें जहन्नम ही भेज देती। शिवाजी और सम्भाजी इस इलाके में भगवानस्वरूप हैं।" उतावले होकर बौखलाये सिपाहियों और उनके बेदम हुए घोड़ों को देखकर सम्भाजी :: 669