छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंगड़ेरियों के लड़के भीतर ही भीतर हँस रहे थे। यह विकट राह उनकी नित्य प्रति की जानी पहचानी थी। इसीलिए वे रहबर बकरी के बच्चों की तरह छलाँग लगाते हुए सबसे आगे चल रहे थे। चढ़ाई चढ़ने में जैसे-जैसे विलम्ब हो रहा था उसी क्रम में गणोजी का कलेजा पानी-पानी हो रहा था। भय के कारण गणोजी पूरी तरह घबरा गया था। वह सोचता था कि कहीं कोई चूक हो गयी या कोई धोखा हो गया तो सम्भाजी उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे। दोपहरी बीत गयी। शाम की ठंडी हवा बहने लगी। आधा आकाश पार कर सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया। फिर भी पैरों के नीचे का रास्ता समाप्त होने को नहीं आ रहा था। निरन्तर के परिश्रम से पूरी तरह थके हारे मुगल घुड़सवार हैरान हो गये थे। उनकी जलती निगाह कह रही थी, 'गणोजी को खा जाऊँ या पीसकर पी जाऊँ?' मुकर्रब गणोजी की ओर सशंक नजरों से देखने लगा। किसी के आदेश की प्रतीक्षा किये बिना घोड़े बीच राह में ही बैठने लगे। थके-हारे सैनिक भी जमीन पर लेटने लगे। भिश्ती पानी से भरी चमड़े की थैलियाँ सेना में घुमाने लगे। इसी अवसर का लाभ उठाकर गणोजी मुकर्रब को एक पेड़ की आड़ में ले गया और हाथ जोड़कर बोला, "सरकार, इस मुफ्त की विपत्ति को क्यों जिन्दा रखते हो? धोखा हो जाएगा। इस प्रकार का खतरा मत उठाओ।" "तो क्या करना चाहते हो?" "सम्भा की और उस कपटी कलुशा की मुंडी यहीं पर छाँट दो। उसे सीधे ले जाकर बादशाह के सामने पेश कर दो।" "नहींऽऽ यह मुमकिन नहीं है।" मुकर्रब गरजा। "सम्भा को जीवित पकड़ने का बीड़ा मैंने बादशाह के सामने उठाया है।" "खान साहब, जिन्दा क्या और मुर्दा क्या? काम होने से मतलब।" गणोजी ने झुँझलाकर कहा। "नहीं गणोजी! पिछले आठ वर्षों से पाँच लाख की फौज जो कार्य नहीं कर पायी उस पर मुकर्रबखान के इस दक्खिनी मुसलमान सरदार ने विजय हासिल की है। सारी दुनिया में मेरा कितना नाम होगा? बादशाह तो खुशी से पागल हो जाएगा।" घुड़सवार सिपाहियों के पैरों में असह्य पीड़ा हो रही थी। किन्तु सम्भाजी और कवि कलश के कलेजों पर वेदनाओं का नृत्य हो रहा था। उनका सारा शरीर रस्सियों से इतना कसकर बाँधा गया था कि वह शरीर को काट रहा था। चढ़ाई पर चढ़ रहे घोड़ों के शरीर की हरकत के साथ रस्सियाँ शरीर में चुभ रही थीं। खून बह रहा था। शरीर की पीड़ा में हाथ-पैर फटकारने का व्यर्थ प्रयत्न उन दोनों ने कब का छोड़ दिया था। शम्भूराजा और कविराज की ऐसी दशा हो गयी थी जैसे गरुड़ का 670 :: सम्भाजी