भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 673

सारा शरीर अजगर की चपेट में आ गया हो, उसका शरीर, उसके पंख निगलने के बाद अजगर के तीखे दाँत गरूड़ की गर्दन पर टिक गये हों और गरुड़ अपनी अभागी आँखों से बाहर का डूबता संसार देख रहा हो। पैरों के नीचे का विषैला रास्ता समाप्त होने को आया। मालेघाट के माथे पर मराठों के गश्ती पहरे की अन्तिम चौकी थी। कविराज को इस बात का पूरा ध्यान था। मुँह में लम्बा-चौड़ा कपड़ा भरा था किन्तु उस समय कविराज के दाँतों में ही बुद्धि आ गयी थी। दाँतों में ही सारी शक्ति केन्द्रित हो गयी थी। उन्होंने धीरे-धीरे दाँतों से मुँह का कपड़ा चूहों की तरह कुतरना आरम्भ कर दिया। घाट के माथे पर की चौकी समीप आने लगी। चौकी के सिपाहियों की आवाजें आने लगीं। इन आवाजों से मुकर्रबखान भयभीत हो गया। उसने गणोजी की ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा। गणोजी ने आँखों से ही उसे शान्त रहने का संकेत किया। अब एक बार मालेघाट समाप्त हो गया तो दो-ढाई घंटों में कराड़ आ जाएगा। कराड़ में पन्द्रह हजार की मुगल सेना तैयार थी। वहाँ से आगे मुगलों का प्रदेश आरम्भ होता था। एक बार यदि शम्भू महाराज वहाँ चले गये तो सब कुछ समाप्त हो जाएगा। कवि कलश ने बड़े ध्यान से सुना। चौकी से आवाजें आ रही थीं। जैसे डूबते हुए जहाज के पास यदि कोई लकड़ी का टुकड़ा दिख जाये तो डूबता हुआ व्यक्ति उस तैरते टुकड़े को पकड़ने के लिए छटपटाने लगता है, वही स्थिति कवि कलश की हो रही थी। मुँह में ठूँसा हुआ कपड़ा निकल चुका था। उनके शरीर में जितनी शक्ति थी, उसे एकत्र कर कवि कलश अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाए, "बचाओऽऽ, बचाओऽऽ मेरे शम्भूराजा को बचाओऽऽ।" कलश का यह घातक चिल्लाना सुनते ही इखलासखान ने अपने हाथ के चाबुक को कविराज के मुंडे हुए सिर पर इतने जोर से मारा कि कविराज के सिर से निकलने वाला खून का फौवारा इखलास की दाढ़ी तक पहुँच गया। कविराज बेहोश हो गये। उनकी गर्दन एक ओर झुक गयी। नीचे से आवाज सुनकर ऊपर चौकी सजग हो गयी। "कौन है बे? कौन है वहाँ?" ऊपर से आवाज आयी। मुकर्रब घबरा गया। किन्तु उसी समय गणोजी ने ऊँचे स्वर में नारा लगाया, "सम्भाजी महाराज की जयऽऽ।" चौकी के थानेदार ने सभी की बारीकी से जाँच की। पूछताछ करने के लिए अधिक था ही क्या? गणोजी रायगढ़ की महारानी येसूबाई के सगे बड़े भाई थे। थानेदार की नजर खून और धूल से लथपथ उन दो सौदागरों पर भी गयी। कवि कलश के सिर पर खून के ताजा निशान थे। किन्तु चक्कर आ जाने से उनकी गर्दन एक ओर लुढ़क गयी थी। शम्भूराजा के शरीर पर मुसलमानी पहनावा था, दाढ़ी- मूँछ सफाचट थी। मुंडे हुए सिर पर सूखे हुए खून के काले-नीले निशान थे। धूर्त सम्भाजी :: 671