छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यक्ति बीच में गिर पड़ा। शम्भुराजा ने अपना घोड़ा घुमाया और रक्तस्नात उस व्यक्ति की ओर देखा। ये थे सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े। म्हालोजी बाबा के धराशायी होते ही मराठे पूरी तरह भड़क उठे। सन्ताजी को अपने पिता के शव की ओर देखने का अवकाश नहीं था। सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल आदि जान लगाकर लड़ रहे थे। इसी समय किसी ने मुकर्रब के घोड़े के कूल्हे पर तलवार से जोरदार आघात किया। पैरों की हड्डियाँ टूट जाने से घोड़ा जोर से हिनहिनाता हुआ बगल में गिर गया। घोड़े के नीचे आने के पहले ही खान ने दूसरी छलाँग लगा दी। इससे पहले किसी ने मुकर्रब को प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं था। परन्तु अपने पहनावे और रोब- दाब से वही मुगल सरदार लग रहा था। शत्रु का सरदार बिना घोड़े का हो गया है, यह देखकर मराठे उसकी ओर दौड़े। मुगल सैनिक भी पूरे जोश में थे। दोनों दल के सैनिकों में घमासान युद्ध हो रहा था। एक दूसरे की गर्दनों पर तलवारें भाँज रहे थे। तलवारों के चपल वार से सिर कट-कटकर बगल में गिर रहे थे। लाल खून से पूरा बगीचा भर गया था। घोड़े से नीचे गिरना मुकर्रब को अपशकुन-सा लगा। मुगल सैनिकों ने उसे पीछे खींच लिया। सिपाही मुकर्रब को दूसरे घोड़े पर बिठाने लगे। इस बीच मराठों ने उन्हें दबाते-कुचलते बगीचे से बाहर निकाला। इसी समय दूर विश्राम कर रहे पचास-साठ मराठी सैनिकों का दल 'हर-हर-महादेव' की गर्जना करते हुए बड़े वेग से महादरवाजे से निकलकर आया। मुकर्रब की दृष्टि उस ओर गयी। उसे लगा कि कोठी में अभी भी हजार-दो हजार की फौज होगी। मराठों का मुकाबला कठिन और जानलेवा था। दूसरे घोड़े पर बैठते हुए मुकर्रबखान ने अपने आसपास देखा तो सैकड़ों पठानों और दक्खिनी मुसलमानों के शव बिखरे पड़े थे। उसके बारह सौ में से कम-से-कम चार सौ सैनिक जान गँवा चुके थे। खान उस जंगल की रहस्यमयी कोठी और आसपास के हरे-भरे जंगल से पूरी तरह घबरा गया। अपनी बची-खुची सेना को उसने धीमे स्वर में आदेश दिया, "भागो पीछेऽऽ।" शत्रुसेना लड़ाई छोड़कर पीछे हट गयी। शम्भुराजा की दृष्टि बगीचे पर गयी। खलिहान में मक्के के गट्ठों की तरह चारों ओर शव बिखरे पड़े थे। जो जिन्दा थे वे तड़प रहे थे, चिल्ला रहे थे, 'या अल्लाह।' 'हे भगवानऽऽ' कराहने की ऐसी आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। घायल घोड़ों का पीड़ा से हिनहिनाना सुना नहीं जा रहा था। अपनी हुकूमत के इलाके में शत्रु इतनी दूर तक कैसे चला आया ? यह सोचकर शम्भुराजा को धक्का लग रहा था। चारों ओर के रास्ते पर सेनाएँ तैनात हैं, हर चौकी पर पहरे लगे हैं। समुद्र से लेकर थल तक के रास्ते पर कड़े पहरे लगे फिर वह शत्रु इतने समीप तक कैसे आ गया? निश्चय ही कहीं धोखा हुआ है। किसी धोखेबाज की उँगली पकड़कर ही शत्रु-सेना यहाँ तक आ पायी है। 658 :: सम्भाजी