छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 661, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिक विचार करने का समय नहीं था। कम से कम साढ़े तीन सौ मराठे बलिदान हो चुके थे। शम्भुराजा के साथ केवल सौ-सवा सौ मावल ही बचे थे। सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल जैसे मँजे हुए वीर शम्भू महाराज के अगले आदेश की प्रतीक्षा करते खड़े थे। अगली यात्रा जल्दी हो सके, इसलिए राजा ने अपनी लड़ाकू सेना को बड़े आत्मविश्वास के साथ कल रात से ही भेजना आरम्भ कर दिया था। अब उनके साथ बहुत मामूली संख्या में फौज थी। पेड़ों और कँटीली झाड़ियों से भरी यह दुर्गम जगह जहाँ सूर्य की किरणें भी सरलता से नहीं पहुँच पातीं वहाँ शत्रु पहुँच जाएगा, वह भी इतनी सरलता से, ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था। खंडो बल्लाल, धनाजी सहित अनेक वीरों के छोटे-बड़े घावों के कारण उनके कपड़े खून से सने थे। अभी भी अनेक सैनिकों के ललाट और गालों से खून बह रहा था। लड़ाई के दौरान एक पठान का बाण कवि कलश की कलाई में घुस गया था। उन्होंने जल्दी जल्दी में पट्टी बँधाई थी, परन्तु खून अभी भी रिस रहा था। इसी समय किसी तरह अपनी जान बचाते हुए दो गुप्तचर भागते हुए वहाँ पहुँचे। वे चिल्लाकर कहने लगे, "महाराजऽऽ महाराज अभी भी कम से कम डेढ़ हजार की फौज पीछे से भागती हुई आ रही है। घर के ही किसी व्यक्ति ने धोखा किया है।" "महाराज! बड़ा धोखा है। जल्दी से आगे निकल जाइये।" दूसरे गुप्तचर ने कहा। धनाजी और सन्ताजी राजा के सामने अपने घोड़े चक्राकार घुमा रहे थे। दोनों में से प्रत्येक ने कम से कम पचास मुगलों की जान ली थी। उनके हाथों की नंगी तलवारों से अभी भी खून टपक रहा था। चेहरों पर, कपड़ों पर अभी रक्त दाग दिख रहे थे। खंडो बल्लाल की आँखों में अभी भी रक्त के फौवारे छूट रहे थे। सभी लोगों ने चिल्लाते हुए पूछा, "महाराज आज्ञा। महाराज आज्ञाऽऽ।" शम्भुराजा ने एक क्षण के लिए आँखें मूँद लीं। भगवान का स्मरण किया। उन्होंने कहा, "मित्रो। मैं आपके जोशभरे पौरुष की उमंग समझ सकता हूँ। परन्तु परिस्थिति ने धोखा किया है। अब तलवार से नहीं बुद्धि से लड़ाई लड़नी होगी।" "याने किस तरह?" "यहाँ न रुककर, हमलोग अलग-अलग रास्तों से जाएँगे। सन्ताजी और खंडोबा आप एक भी क्षण अब यहाँ न रुकें। चलिए हवा की गति से आगे बढ़िए। चिपलून की वाशिष्टी नदी के घाट तक कहीं भी न रुकिए। वहाँ अपनी बड़ी चौकी है।" "पर महाराज आपको छोड़कर?" सन्ताजी का स्वर भर्रा गया। "नहीं भाई, अब एक दूसरे की माया में न अटकिये। सन्ताजी और खंडोबा आपलोग चिपलून की ओर भागिए। रास्ते में येसूरानी और अन्य राजपरिवार की स्त्रियों की पालकियाँ मिल जाएँगी। उनकी रक्षा कीजिए। धनाजी आप बचे-खुचे लोगों को लेकर हातखंबा की ओर निकल जाइये। कुछ भला-बुरा प्रसंग आ जाये सम्भाजी :: 659