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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 793 में से

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चीखते हुए कहने लगा, "महाराज, दुश्मन, संगमेश्वर पर आक्रमण करता चला आ रहा है। छह सात सौ सवारों का दल मैने अपनी आँख से देखा है, महाराज।" इधर-उधर घूम रहे सैनिक अपने-अपने घोड़ों पर सवार हो गये। शंभूराजा ने जोर से आवाज दी, "पाखऱ्याऽऽ"। पाखऱ्या नाम का उनका घोड़ा दौड़ता हुआ पास आ गया। पाखऱ्या महाराज के सामने आकर खड़ा हो गया। आगे की यात्रा के लिए वह पहले से ही सोने और हीरे-मोतियों के गहनों से सज गया था। अपने स्वामी के स्वर की हताशा उसकी समझ में आ गयी। शम्भू महाराज शीघ्रता से घोड़े की पीठ पर सवार हो गये। रणांगण में शत्रु का सामना करने के लिए कवि कलश पहले ही तैयार हो गये थे। वृद्ध म्हालोजी घोड़पड़े की आँखों से आग की लपटें निकलने लगीं। उन्होंने हथेलियों पर जल्दी-जल्दी तम्बाखू मली और जबड़े में रखा। हाथ के भाले की चमचमाती नोंक को ऊपर उछाला। चार-पाँच सौ सैनिकों को लेकर सुरक्षात्मक युद्ध कैसे किया जाय? इसकी योजना शम्भू महाराज ने शीघ्रता से निश्चित की। इतने में सामने के हरे भरे पेड़ों के पीछे से शोर सुनाई देने लगा, 'अल्लाहो अकबरऽऽ अल्लाहो अकबरऽऽ, दीनऽ दीनऽऽ' पीछे से आते मुगलों के घोड़े सामने दिखाई देने लगे। इधर से म्हालोजी घोड़पड़े ने 'हर हर महादेवऽऽ' का नारा लगाया। उसके बाद सन्ताजी और धनाजी जैसे युवकों ने जोरदार गर्जना की, 'शिवाजी महाराज की जयऽऽ, सम्भाजी महाराज की जयऽऽ' घोड़े घोड़ों से भिड़ गये। तलवारें बजने लगीं। घोड़े हिनहिनाने लगे! लोग बेहोश होकर गिरने लगे। चौड़ी पीठ वाले एक ऊँचे घोड़े पर मुकर्रबखान बैठा था। उसने चमड़े का कुर्ता पहन रखा था। तीन-चार दिन की लगातार यात्रा से वह पूरी तरह थक गया था। किन्तु लड़ाई के मैदान में उसने जैसे ही शम्भू महाराज को देखा, उसके शरीर में भयंकर जोश व्याप गया। इसी अकेले शम्भू को मारने या पकड़ने की आकांक्षा से वह पिछले कितने दिनों से पागल हो रहा था। देखते-देखते मुगलों ने शंभूराजा की कोठी और सामने के परिसर को घेर लिया। कुछ लोग नदी की ओर भागे, किन्तु शत्रुओं ने उस रास्ते को भी रोक दिया। आरम्भ से मुगल भारी पड़ रहे थे। मुगलों के पास कम से कम हजार-बारह सौ घोड़े थे। उनसे चारों ओर से घिरे शम्भू महाराज के चार सौ सैनिक बहुत विवश दिखाई दे रहे थे। इतने वर्षों से पीछा करने के बाद; लाखों सैनिकों की हानि, सुदीर्घ प्रयास, जानलेवा मानसिक यातना के बाद भी अप्राप्य-सा सम्भाजी घात-अपघात से अप्रत्याशित रूप से हाथ लग रहा था। इस कल्पना मात्र से मुगल सैनिकों में अपार जोश भर गया था। सपासप तलवार चलाते हुए मुगल सैनिक शम्भू महाराज की ओर बढ़ रहे थे। मराठी सेना सैनिकों की भयंकर बाढ़ में टूटी नाव की तरह अटकी 656 :: सम्भाजी