छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबल्लाल ने भी वहीं रुकने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि महाराज के निकलने के साथ ही वे भी निकलेंगे। इस बीच रंगनाथ स्वामी और कवि कलश के बीच आध्यात्मिक विषयों पर रात से ही चर्चा चल रही थी। यह चर्चा अनेक धार्मिक अनुष्ठानों और विधियों पर हो रही थी। दोनों ही शम्भूराजा के लिए बहुत चिन्तित थे। दिन निकल आया। लोगों के नित्य के क्रिया कलाप आरम्भ हो गये। किन्तु फरवरी महीने की ठंडक अभी विद्यमान थी। महाराज ने बाग की खुली हवा में फरियादें सुनने का निर्णय लिया था। सेवकों ने तत्काल गद्दे तकिये लगा दिये। सूरज की कोमल किरणें ऊँचे पेड़ों से नीचे झरकर मृगशावकों की भाँति आसपास खेलने लगीं। पीछे शास्त्री नदी पर कुहरे के ढेर के ढेर आसमान की ओर सरकने लगे। बगीचे में शम्भूराजा द्वारा न्यायदान का कार्य आरम्भ हुआ। खंडो बल्लाल की कलम तेजी मे चल रही थी। महाराज मामलों के निर्णय में व्यस्त थे। कवि कलश ने समय का उपयोग करना चाहा। स्वामी जी और कवि कलश शास्त्री नदी पर गये। उन्होंने वहाँ रेती पर कुछ पूजा-विधि सम्पन्न की। शम्भूराजा के सुख और कल्याण के लिए देवी-देवताओं की पूजा की जा रही थी। अर्जॉजी और गिरजोजी स्वभाव कृपण थे। दोनों यादव बन्धु अपनी अपनी कैफियत रख रहे थे। शम्भू महाराज गर्मी और धूप को बढ़ते हुए देखकर बेचैन हो रहे थे। उन्होंने यादव बन्धुओं से आग्रह किया, "मुद्दे की बातें करिए, शब्दजाल न फैलाइये।" किन्तु यादव बन्धु पीछे हटने को तैयार न थे। उनकी फरियाद सुनने में लगभग पौने दो घंटे बीत गये। शम्भूराजा ने पूरी बात सुनी और खंडो बल्लाल को निर्णय लिखने के लिए बताया। वहाँ उपस्थित गरीब जनता की शिकायतें कुछ बड़ी न थीं। उन सभी पर आधे घंटे में शम्भू महाराज ने विचार कर लिया। किन्तु अब तक बढ़ती धूप की आँच आने लगी थी। सुबह के नौ बजने को आये। महाराज एक अति गरीब व्यक्ति की फरियाद सुनने में व्यस्त थे। इतने में जैसे किसी के पेट में भाला घुस जाये और वह चीखने- चिल्लाने लगे, उसी तरह दूर से आक्रमण का शोर सुनाई देने लगा। महाराजऽऽ, महाराजऽऽ, गजब हो गया। धोखा हो गया है। उस आवाज को सुनकर शम्भूराजा धक्क से रह गये। बगल में रखी तलवार हाथ में लेकर खड़े हो गये। दरवाजे पर हलचल मच गयी। बाग के शोरगुल को सुनकर कवि कलश भी तेजी से नदी की कछार चढ़कर ऊपर आ गये। इसी बीच एक हरकारा पसीने से तर-ब-तर शम्भू महाराज के सामने आकर खड़ा हो गया। जिस घोड़े पर वह सवार था, उसके मुँह से फेन गिर रहा है। उसके घुटने पथरीले रास्ते पर दौड़ते दौड़ते फट गये थे। हरकारा बड़े लाचार स्वर में सम्भाजी :: 655