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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 793 में से

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लिया। राजा के उस प्रगाढ़ आलिंगन में येसूबाई को अपने पिता पिलाजीराव का स्मरण हो आया। येसूबाई की आँखों के आँसुओं को अपनी उँगलियों से पोंछते हुए शम्भू महाराज ने हँसते हुए कहा, "इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? तुम्हें इतना भी भरोसा किसी पर न रहा? सह्याद्रि का यह हरा-भरा जंगल, यहाँ की यह लाल मिट्टी, शिवाजी के पुत्र सम्भाजी के साथ धोखा करेंगे? क्या तुम्हें ऐसा लगता है?" बहुत विलम्ब हो रहा था। बाहर दिन निकल आया था। सूर्योदय के पूर्व ही संगमेश्वर से बाहर निकल जाना था। दरवाजे पर पन्द्रह-बीस पालकियाँ तैयार खड़ी थीं। कुछ दासियाँ भी साथ थीं। राजा को एक बार पुनः प्रणाम करके येसूबाई अपनी पालकी में बैठ गयीं। चन्दनी मेहराब के झरोखे से वे बाहर झाँकने लगीं। महल की सीढ़ियों पर शम्भू महाराज खड़े थे। राजा को दंडवत करके कहारों ने पालकी उठा ली। उसी समय शम्भू महाराज ने धीमे स्वर में कहा, "रुको!" महाराज तेजी से चलते हुए पालकी के पास आ गये। येसूबाई ने पूछा, "क्या बात है स्वामी?" "महारानी जरा भी चिन्ता न करें। आपकी पालकी दोपहर को चिपलूण की वशिष्ठी नदी के किनारे पहुँचेगी। वहाँ अमराई में दशमी का निवाला मुख में रखने से पहले ही मैं घोड़ा दौड़ाते वहाँ पहुँच जाऊँगा।" राजा के इस प्रकार भरोसा देने से येसूबाई उस वियोग के क्षण में भी बड़ी मधुरता से हँस पड़ी। शम्भूराजा ने पुनः कहा, "परसों हम रायगढ़ के पायदान तक पहुँच जाएँगे। वहाँ आपको एक महत्त्वपूर्ण कार्य करना है।" "कौन-सा?" "प्रवेशद्वार के चितदरवाजे पर लगने वाली पत्थर की देहरी को ध्यान से देखकर रखिए।" "किसलिए?" "आने वाले कुछ दिनों में हम अवश्य ही विजयी होंगे। वह औरंगजेब कहीं-न-कहीं मुझे अवश्य ही मिलेगा। उमका सिर काटकर हमें उसी देहरी के पत्थर के नीचे दफनाना है।" तीन प्रातःकाल होते ही दरबार की कार्यवाही आरम्भ हुई। महाराज घंटे-दो घंटे के लिए वहाँ रुकने वाले थे। यह जानने पर सन्ताजी, धनाजी, कवि कलश और खंडो 654 :: सम्भाजी

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