भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 663, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 663

इस घने जंगल से जान बचाकर, पहले बाहर निकलना था। कवि कलश घोड़ा दौड़ाते हुए विनती के स्वर में बोले, "राजन आप आगे जाइये, अपनी जान बचाइये, राज्य बचाइये। मेरी चिन्ता न करें। मुझे यहीं पर रुकने दें।" कविराज का काले करौंदे जैसा भरा मुख महाराज ने देखा। परन्तु उस स्थिति में कविराज से निवेदन करते हुए निश्चन्तता से कहा, "नहीं कविराज! यह असम्भव है। 'राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति सः बांधवः।' "जो राजदरबार और श्मशान में साथ देता है वही सच्चा बन्धु होता है। चलिए चिन्ता न कीजिए।" नावड़ी बन्दरगाह से घोड़ा दौड़ाते हुए उन्होंने लगभग दो कोस की दूरी तय की थी। शम्भूराजा ने दाहिनी ओर देखा। सामने झाड़ियों के बीच नदी के किनारे सरदेसाई की कोठी दिखाई दे रही थी। दाहिनी ओर मन्दिर और हरी झाड़ियों में अधछिपे उनके कलश, सब कुछ शान्त लग रहे थे। तट की पथरीली सीढ़ियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे कोई पथिक पानी में पैर लटकाए बैठा हो। महाराज ने घोड़े की लगाम खींचकर उसे रोका और पीठ पीछे शास्त्री नदी के पाट को देखा। नदी तट की रेत धूप में चमचम चमक रही थी। बीच बीच में छोटी-छोटी धाराएँ और रेत दिख रही थी। नावड़ी पर अचानक हुए आक्रमण का यह कस्बे की ओर अधिकांश लोगों को कोई समाचार न था। पीड़ा और खून से बेचैन हाथ को कविराज ने अपने सीने से दबाकर रखा था। शम्भूराजा ने एक क्षण में निर्णय लिया कि मार्ग में अन्यत्र कहीं रुकने की अपेक्षा यहीं पर वेषान्तर और दिशान्तर करना अच्छा है। क्योंकि इस तरह राजसी वस्त्रों और हीरे जवाहरात के आभूषणों के साथ आगे जाना धोखादायक हो सकता था। महाराज ने जल्दी से अपना घोड़ा दाहिनी ओर आड़ में ले लिया। अन्य साथियों ने भी अपने घोड़े आड़ में कर लिए। महाराज ने अपने घोड़े पाखर्या के गले से सारे साज उतार लिए। आगे बढ़ते बढ़ते अपने शरीर से भी सारे आभूषण उतार लिये। उन्हें समेटते हुए वे सरदेसाई की सीढ़ियों पर पहुँच गये। बाहर से अचानक खून सने कपड़ों में शम्भूजी महाराज और कविराज ने प्रवेश किया तो नौकर-चाकरों में खलबली मच गयी। रंगोबा सरदेसाई बाहर दरवाजे पर ही बैठे थे। नाई उनके बाल काट रहा था। खून से सने कपड़ों में राजा को देखकर रंगोबा उठकर खड़े हो गये। घर के अन्य सदस्य-स्त्री-बच्चे भागते हुए बाहर आये। उन्होंने यह अनुमान लगाया कि निश्चित रूप से कुछ धोखा हुआ है, कोई संकट आया है। सम्भाजी :: 661

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास) · पृष्ठ 663, कुल 793 में से · BharatKosha