छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 664, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"महाराज, यह क्या हुआ? ऐसा कैसे हुआ? बताइये मैं क्या करूँ? बताइये महाराज।" सरदेसाई ने घबराकर कहा। "घबराओ नहीं। लेकिन जल्दी करो! कविराज के हाथ की मरहमपट्टी कर दो। हमें आगे जाने की जल्दी है।" शम्भूराजा ने कहा। एक भी क्षण नष्ट किये बिना राजा नाई के सामने बैठ गये। उन्होंने संकेत किया और नाई ने उनके रेशम से मुलायम बालों और नोकदार दाढ़ी को काटना आरम्भ किया। सरदेसाई के नौकरों ने आँगन लगी औषधीय वनस्पति का गूदा निकालकर कविराज के घाव में भरा और फिर चारों ओर कसकर पट्टी बाँध दी। सिर और दाढ़ी को सफाचट कर देने से शम्भूराजा का चेहरा किसी योगी के समान दिखाई दे रहा था। रंगोबा की बूढ़ी माँ कृष्णाबाई दौड़ती हुई बाहर आयी। सभी अनुभव कर रहे थे कि महाराज पर कोई भयानक संकट आ गया है। रंगोबा की माँ सत्तर वर्ष की थीं, पतली, लम्बी, छरहरे शरीर की। उनकी गोरी झुर्रियों से भरी मुखाकृति को देखकर शम्भूराजा को जीजामाता की याद आ गयी। उन्होंने अपने हाथ की मोतियों की माला को उन्हें पहना दिया। कृष्णाबाई ने गदगद होकर राजा को गले से लगा लिया। पूरी कोठी में हाहाकार मच गया था। बाहर नदी के किनारे झाड़ियों में पन्द्रह-सोलह घोड़े खड़े थे। तोप से निकली गोली की तेजी से वे दो कोस तक भागते हुए आये थे। रेती और पत्थरों से होकर भागते हुए उनके घुटने फट गये थे। पाखर्या की नाक से खून बह रहा था। महाराज ने लगाम को इतने जोर से खींचा था कि उसकी नाक रगड़ खा गयी थी। आगे की दौड़ और भी खतरनाक थी। इसके बाद कब और कहाँ रुकना है कुछ निश्चित नहीं था। जितना पी सकते हैं पी लेना चाहिए। आगे की दौड़ के लिए तैयार रहना चाहिए। उन मूक जानवरों ने ऐसा सोचा होगा। पाखर्या ने बड़ी सावधानी से आसपास देखा। आगे-पीछे, इधर उधर कोई जीव जन्तु तक दिखाई न दिया। वह प्यासा घोड़ा थोड़ा आगे सरक गया। धीरे से पानी में अगले दो पैर डालकर, पीठ झुकाकर पानी पीने लगा। उसके साथ अन्य घोड़े भी सरक गये और सामने साफ पानी पीने लगे। पानी पीते पीते कुछ समय बाद पाखर्या को सामने पानी में हिलती-डुलती आकृति दिखाई दी। वह होशियार जानवर घबरा गया। उसने कान खोलकर और गर्दन सीधी करके सामने के तट पर देखा। दूसरे किनारे पर रेती में दबे पैरों से लुकते-छिपते शम्भूराजा की खोज में शत्रु का एक दल आ गया था। सामने की बालू पर अत्यन्त घबराया हुआ गणोजी शिर्के खड़ा था। अपने 'बाप को दिखाओ नहीं तो श्राद्ध करो' ऐसे आवेश में मुकर्रबखान गणोजी को खींचकर वहाँ ले आया था। उसके साथ साठ-सत्तर घुड़सवार तैयार खड़े थे। बगीचे 662 :: सम्भाजी