छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी लड़ाई में गणोजी ने अपने को पेड़ों की आड़ में छिपा लिया था। परन्तु पहले आक्रमण में थोड़ी-सी तलवारबाजी करके शम्भूराजा निकल गये। उसी समय मुकर्रब ने गणोजी को खींचकर बाहर निकाला। खान की दो हजार की फौज अभी भी संगमेश्वर के मैदान में थी वह अभी तक गाँव तक पहुँची न थी। मुकर्रब को यह भी जानना था कि शम्भूराजा के पास युद्ध के लिए कितनी फौज है? इसलिए सलामी में उसने थोड़ा पीछे हटकर अन्दाजा लिया। पीछे रह गयी फौज का नेतृत्व मुकर्रब का बेटा इखलामखान कर रहा था। अब इखलास अपनी दो हजार फौज के साथ संगमेश्वर पहुँच गया था। कोई शोरगुल या हो-हल्ला किये बिना पिता-पुत्र ने नदी के किनारे से झाड़-झंखाड़ों वनों-जंगलों से अपनी खोज शुरू कर दी थी। बालू में खड़े गणोजी की जली-कटी नजर नदी के दूसरे किनारे पर गयी। उस झाड़ी में चुपचाप चोर की तरह पानी पीते घोड़े, उनके शरीर पर रेशमी वस्त्र, पाखऱ्या के पैरों में घुटनों के ऊपर सोने के चार-चार तोड़े उसे दिखाई पड़े। गणोजी धीरे से किन्तु उत्साहित स्वर में मुकर्रब से बोला, "खान साहब! वह, वह देखिए सम्भा का घोड़ा।" पाखऱ्या ने साँस रोककर अपनी ओर देखते हुए शत्रुओं को देखा। देखते ही वह ईमानदार घोड़ा पीछे मुड़ा और कोठी की ओर तेजी से भागा। वह हिनहिनाते हुए शम्भूराजा को खतरे का संकेत देने लगा। इस समय तक शम्भूराजा ने तैयारी कर ली थी। वे रंगोबा की माँ से विदा ले रहे थे। इसी समय महाराज ने पाखऱ्या का अशुभसूचक हिनहिनाना सुना। उनका कलेजा मुँह को आने लगा। उनकी समझ में आ गया कि निश्चित रूप से कोठी को घेरा जा रहा है। उन्होंने एक क्षण के लिए जीजामाता, शिवाजी महाराज और जगदम्बा का स्मरण किया। यही समय था घने जंगलों से फरार होने का। जंगली पंछी के समान उड़ान भरने का। उन्होंने कवि कलश की ओर देखा उनका हाथ सीने के साथ ठीक से बाँध दिया गया था। फिर भी हाथ से खून टपक रहा था। चेहरे पर असहनीय वेदना झलक रही थी। कविराज ने झट से शम्भूराजा के पैर पकड़ लिये वे रोते कलपते कहने लगे, "राजन आप यहाँ से निकल जाएँ नहीं तो बन्दी बना लिए जाएँगे। कुछ भी करें लेकिन पहले यहाँ से निकल जाएँ।" अब कृतज्ञता के दो आँसू बहाने का भी समय न था। रंगोबा ने समीप रखी तलवार शम्भूराजा के हाथ में पकड़ा दी। कृष्णाबाई ने चावल लेकर राजा की नजर उतारी जिससे उनकी सारी ईड़ा-पीड़ा भाग जाय। 'पाखऱ्या' ऐसी आवाज लगाते हुए शम्भूराजा कोठी से बाहर निकले अपने स्वामी को असुविधा न हो इसलिए वह मूक जानवर अगले पैरों को नीचा किये कोठी के बाहर खड़ा था। राजा ने छलाँग लगाई और लगाम खींचकर सामने देखा। जैसे बाढ़ का पानी अचानक चारों ओर फैल जाये, उसी तरह फौज ने पूरे सम्भाजी 663