छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब रायगढ़ से यहाँ आने के लिए पालकी में बैठीं, उस समय सोयराबाई ने उन्हें जिस उपेक्षाभरी दृष्टि से देखा था, उसे वे भूल नहीं पायी थीं। परन्तु शम्भूराजा जैसे ईंट का जवाब पत्थर से देने वाले, अपमान और अन्याय के अवसर पर कपूर की तरह जल उठने वाले कुसुम कोमल और वज्र कठोर, समझदार किन्तु शीघ्र ही क्रुद्ध होने वाले के पति को संभालना उनका प्रथम कर्तव्य था। कठिनाइयों के बीच रहने और उनका सामना करने का येसूबाई को बचपन से अच्छा अभ्यास था। प्रथा के अनुसार कु. सात वर्ष की उम्र में ही शम्भूराजा के साथ उनका विवाह हो चुका था। स्वराज्य पर आने वाली विपत्तियों के साथ उनकी भावनाओं की नाल जुड़ी थी। महाराष्ट्र पर मुसलमानों ने पहला बड़ा आक्रमण किया था। तब पुरन्दर अपमानजनक सन्धिपत्र पर शिवाजी महाराज को हस्ताक्षर करने पड़े थे। इसके अतिरिक्त शम्भूराजा जैसे अपने केवल आठ नौ वर्ष के पुत्र को लेकर आगरा की दास्ता वाली राह पर चलने के लिए विवश होना पड़ा था। पिता-पुत्र को आगरा की ओर गये कई महीने हो चुके थे। यहाँ राजगढ़ पर जीजा माता बहुत चिन्तित होने लगीं। अपने पुत्र और प्रिय पौत्र की याद करके रात बेरात घबराकर उठ जाती थीं। भोर के घने अँधेरे में पद्मावती के तालाब पर जाती थीं। कलश भर भर कर वहाँ के महादेव का अखंड अभिषेक करती थीं। तब उनके साथ उनकी छोटी सी पौत्रवधू येसूबाई भी होती थी। उसी तालाब के किनारे ही शम्भूराजा की माताजी सईबाई की भी समाधि थी। येसू उस पर भी सदैव जल से अभिषेक करती थी। उत्तर से पिता पुत्र कब लौटेंगे, इसका कोई समाचार नहीं था। किन्तु अनेक बार पथिकों आदि से अप्रिय समाचार सुनने में आते थे। लोग कहते थे— "औरंगजेब जैसे मगरमच्छ के हाथ से शिवाजी सरलता से तो छूटेंगे नहीं। बादशाह के मन में खोट है। राजा को दूर कन्दहार में भेजकर बादशाह कोई घात करना चाहता है। वह राजा को अपने रास्ते से हटाना चाहता है। ऐसी खबरें सुनकर महाराज का परिवार चिन्तित हो उठता था। देखते देखते वर्षा ऋतु समाप्त हो गयी। आसमान में बादलों का नामोनिशान न रहा। जंगल के झरने और नहरें सूख गये। हवा के साथ नाचनेवाली घास भी अपना रंग बदलने लगी। घाम का रंग पीला होने लगा। ऐसे समय में जीजा माता और येसूबाई का धैर्य साथ छोड़ने लगा। दूध से भरे थनवाली गाय जिस तरह बछड़े की ममता में विकल होकर खूँटे के चारों ओर घूमती और चिल्लाती है उसी तरह जीजा माता भी व्यग्र होने लगीं। राज्य और परिवार पर आये महान संकट से दोनों व्यथित थीं। दोनों मन्दिर में घंटों तक पूरा दिन बैठी रहती थीं। एक दिन महल के दरवाजे पर भगवाधारी साधुओं का एक झुंड आ गया। 64 . सम्भाजी