छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 735, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें“ऐसा रंग और ये मस्ती ?” “क्यों नहीं? अभी भी हिम्मत है तो हमारे शरीर की ये बेड़ियाँ खोल दो और तुम्हारा कोई भी सिपहसालार, शहजादा या कोई सामने आये तो आमने सामने की लड़ाई में हमारे हाथों की नाचती तलवार तुम्हारे सवालों का सही जवाब दे देगी।” बादशाह कुछ नहीं बोला। कुछ समय तक उसी तरह चुप रहकर नाटकीय ढंग से बोला, “सम्भा तुम्हारे जुलूस के समय क्या कम लोगों ने तुम्हें देखा? कौन आया तुम्हारी मदद के लिए? बेवकूफ राजा, अपनी प्यारी जिन्दगी बचा। आरजू, हसरत, महत्त्वाकांक्षा आदि छत से लटकती झूमर के समान हैं। एक बार टूटकर गिरीं तो उनका काँच बटोरने के लिए भी कोई नहीं रुकता।” शम्भूराजा कुछ बोल नहीं रहे थे। किन्तु क्रुद्ध लाल आँखें बादशाह पर घूम रही थीं। सम्भाजी को समझाने का प्रयत्न करते हुए औरंगजेब ने कहा, “दुनियादारी की तराजू में सिर्फ व्यवहार तौला जाता है। जो व्यवहार शिवाजी के सभी जमाई राजाओं ने समझा वह अक्ल तुम्हें कब आएगी? शिवाजी के जमाई राजाओं की तरह ही उनके राजकुमार का भी बादशाही फौज में सम्मान किया जाएगा। मन की शंका को निकाल दो। मुझे अपना मानो।” “मेरा जुलूस निकालकर आपने मेरा कितना सम्मान किया? यह दुनिया को अच्छी तरह पता चल गया है।” “वह जुलूस एक सबक था। केवल आपके लिए नहीं बल्कि अल्लाहताला द्वारा बहाल की गयी इस सल्तनत में जो भी बदमाश सिर उठाएँगे, उन सबके लिए।” शम्भूराजा कुछ अधिक नहीं बोले। बादशाह भीतर ही भीतर बहुत उद्विग्न हो गया था। शम्भूराजा को कैद किये बीस दिन बीत गये थे। बादशाह के हाथ किलों की चाभियाँ नहीं लग रही थीं। जुल्फिकारखान का गुप्त पत्र आया था। “अभी तक रायगढ़ पर क़ब्ज़ा नहीं हुआ। हमलोग महाड़ में डेरा डाले हुए हैं। रायगढ़ को घेरने की कोशिश कर रहे हैं कि धनाजी और सन्ताजी के खुफिया लुटेरे रात बेरात टिड्डियों की तरह हमला कर देते हैं और हमारी बड़ी बर्बादी करते हैं। सह्याद्रि में हम प्रविष्ट तो हो गये हैं किन्तु किलों पर विजय पाना मुमकिन नहीं लगता।” यह समाचार दिल दहलाने वाला था। रायगढ़ की रानी भी शरण में आने का नाम नहीं ले रही थी। थोड़ा बहुत यश मिलना बादशाह के लिए आवश्यक हो गया था। अपनी मधुर वाणी की मोहिनी शम्भूराजा पर डालने का प्रयास करते हुए औरंगजेब ने कहा, “सम्भा तुम्हारे पिता, उस काफिर शिवा से मुझे हमेशा ईर्ष्या होती है।” सम्भाजी राजा ने गहरी साँस ली। उन्होंने बादशाह की आँखों में अपनी क्रुद्ध सम्भाजी :: 733