छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 734, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे एकाध ने हिम्मत करके कहा, "जहाँपनाह, चाहें तो आप स्वयं आकर बन्दोबस्त देख लें।" "क्यों नहीं? तुम्हारी मूर्खता के लिए अब मुझे गश्तीवालों की तरह रात में घूमना पड़ेगा?" ऐसा कहकर बादशाह रुका नहीं, वह तत्काल बाहर निकला। उस रात बादशाह ने अनेक चौकियों और पहरों का निरीक्षण किया। दूसरी रात को भी चक्कर लगाया। तीसरी रात को वह उस ओर गया जहाँ वे खतरनाक राजबन्दी कैद किये गये थे। उसके साथ केवल असदखान था। वहाँ पहुँचने से पहले बादशाह ने इस बात की पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी कि कवि कलश और सम्भाजी को बेड़ियों और जंजीरों से ठीक तरह से बाँधा गया है कि नहीं? उनके बन्धन ढीले तो नहीं हैं? यह जान लेने के बाद ही बादशाह ने वहाँ पाँव रखा था। बन्दोबस्त के निरीक्षण का नाटक करते हुए बादशाह उन बन्दियों तक पहुँचा था। उन दोनों का भोजन बहुत कम हो गया था। मार-पीट के कारण शरीर के वस्त्र फट गये थे। किन्तु उनकी गर्दन की अकड़ और आँखों का रोष जरा भी कम न हुआ था। वजीर असदखान पीछे रुक गये। जिस प्रकार कोई चिड़ियाघर में बँधे बाघ के बच्चे को देखता है उसी प्रकार औरंगजेब ने सम्भाजी राजा को देखा। राजा की ओर क्रोध और कुत्सा से देखते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा, जवाँमर्द, इस घटना को लगभग तीस वर्ष हो गये। अपने सगे भाई, शहजादा दारा का एक मरियल हाथी पर ऐसा ही जुलूस दिल्ली की सड़कों पर निकाला था। उस समय उस बेवकूफ की बेइज्जती पर मैं खूब हँसा था।" "बादशाह तू मूर्ख है। दारा एक भला, नेकदिल इनसान था। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का प्रिय शहजादा।" बीच में ही कवि कलश बोल पड़े। "पागल शायर, तू अपनी जबान पर लगाम लगा नहीं तो चटर चटर बोलने वाली इस लाल जीभ को जड़ से उखाड़ना पड़ेगा।" बादशाह कड़ककर बोला। कलश थोड़ा चुप हुए, तब बादशाह ने आगे कहा, "प्रजा को मोहित करने की कला दारा को अच्छी तरह मालूम थी। इसीलिए खुली सड़क पर दारा का जुलूस देखकर अनेक लोग छाती पीट रहे थे। औरतें दीवारों पर सिर पटक रही थीं। हमारी मूर्ख प्रजा ने कितना रोना-धोना मचाया था? और इधर शिवाजी की धरती से, विदूषकों का लिबास पहनाकर मैं तुझे मुर्गे की तरह नचाते हुए यहाँ ले आया तो मेरे घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए कोई माई का लाल आगे नहीं आया। बोलो, यह तुम्हारी हार है या जीत?" "केवल धोखा। बेवकूफ बादशाह इस तरह धोखे और बेईमानी के दाव-पेंच से गढ़ी गयी कहानी को तुम यदि अपनी जीत मानते हो तो तुम गद्दारों के बादशाह माने जाओगे, हिन्दुस्तान के नहीं।" शम्भू महाराज ने कहा। 732 :: सम्भाजी