छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"पर उससे क्या फर्क पड़ता है?" "तुम कन्नौज वाले अपना पेट भरने के लिए देव-धर्म का पाखंड करते हो। गंगा-स्नान के लिए आये यात्रियों की दौलत लूटते हो। उनके शरीर के गहने-कपड़े छीन लेते हो। बेचारे तीर्थयात्रियों को गंगा की बालू में दफन कर देते हो और उन बदनसीब यात्रियों के घर सन्देश पहुँचा देते हो कि उन्हें जन्नत मिल गयी।" "हुजूर आप कहना क्या चाहते हैं?" "तू भी उसी कन्नौज का एक ब्राह्मण है, एक भूखा-प्यासा ब्राह्मण।" "परन्तु बादशाह!" "तुमसे हमारा छोटा-सा काम है। सम्भा के मुख्य दीवान या प्रधानमन्त्री के रूप में सारा महाराष्ट्र जानता है। सभी मराठे तुम्हें पहचानते हैं। उस सम्भा के साथ ही तू भी गिरफ्तार हुआ है, यह भी सब जानते हैं। इस समय बस, तुम्हें इतना ही करना है...।" "क्या?" "तुम्हारी मुहर और हस्ताक्षर के साथ मराठों के सभी किलेदारों को खुला हुक्म देना है। उन्हें लिखना है कि सम्भाजी ने अपनी जान बचाने के लिए बादशाह औरंगजेब से सौदा कर लिया है। समझौते के अनुसार सभी किलों को खाली कर देना है। किलों का क़ब्ज़ा मुगलों को दे दिया जाए। इस प्रकार का आदेश देने के लिए स्वयं सम्भाजी ने कहा है।" "झूठा हुक्म? सम्भाजी राजा के नाम से झूठा हुक्म?" कलश ने आश्चर्य व्यक्त किया। "हाँ! क्यों नहीं? कमबख्त शायर, इस छोटी सी शाही सेवा के बदले हम तुम्हें मालामाल कर देंगे। बोलो, कौन-सी जागीर चाहिए तुम्हें? बरेली, सामाराम, कानपुर या आगरा?" अपना उल्लू सीधा करने के लिए उतावला बादशाह पूछने लगा। कलश ने व्यंग्यभरी दृष्टि से बादशाह को नीचे से ऊपर तक देखा। बादशाह की कुत्सित नजरों में अपनी निश्चयपूर्ण दृढ़ दृष्टि से देखते हुए कविराज ने कहा, "बादशाह सलामत आप बहुत कमीने हैं। यह हमें शहजादा और अन्य अनेक लोगों ने बताया है। लेकिन आज तो विश्वास हो गया कि आप दुनिया के कमीनों और मक्कारों के मिरताज हैं।" "जबान सँभालो बेवकूफ!" बादशाह कड़ककर बोला। "अरे, अपने स्वार्थ के लिए सगे भाई के पेट और पीठ में छुरा भोंकने वाला तू, अपने दारा जैसे विद्वान भाई का तूने सिर काट लिया। उस सिर को गोद में खिलौने की तरह रखकर तू देर तक देखता रहा, इतना बड़ा हैवान तू। अपने 738 :: सम्भाजी