छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजन्मदाता माता पिता का पानी रोकने वाला तू एक नम्बर का हरामजादा है। यारी दोस्ती का सच्चा जलवा क्या होता है यह तुम्हारे जैसे पत्थर हृदय मनुष्य को क्या पता चलेगा?'' ‘‘ठहरो पागल! बिना मतलब जिन्दगी गँवा बैठेगा। ’’ ‘‘तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा ? बूढ़ा सियार कहीं का। ’’ ‘‘पागल बाभन, तुझे मैं फाँसी पर लटकाऊँगा। ’’ ‘‘अरे छोड़, सम्भाजी राजा जैसे दिलदार दोस्त के लिए यह नाचीज जिन्दगी कभी भी और कैसे भी समाप्त हो जाये तो बेहतर। ’’ कलश ने सगर्व उद्गार व्यक्त किया। इस मुँहतोड़ उत्तर को सुनकर बादशाह आग बबूला हो गया। उसने चाबुक लाठियाँ लेकर खड़े अपने सैनिकों को अन्दर बुलाया। कविराज के शरीर पर सपासप कोड़े पड़ने लगे। कुछ लाठियाँ भी पड़ीं। उनके मस्तक से खून की धारा फूट पड़ी। जख्मी जानवर की तरह कविराज को वहाँ से खींचते हुए बाहर ले गये। बारह जिस दिन बादशाह ने बहादुरगढ़ छोड़ने का निश्चय किया था उसकी पिछली रात फौलादखान बादशाह के कान में धीरे धीरे कहने लगा, ‘‘जहाँपनाह! सम्भा नहीं तो उसका दीवान ही सही। अन्त में वह कलश फूट गया है। जहाँपनाह से मिलकर वह स्वयं अपना उद्देश्य स्पष्ट करना चाहता है। ’’ बादशाह को अपने कानों और अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। किन्तु यदि इस तरह से कोई बात बनती थी तो वह उसके अनुकूल थी। इसलिए औरंगजेब कलश से मिलने के लिए उत्सुक था। पिछली भेंट में भी कविराज को मुँहमाँगी जागीर देने की तैयारी बादशाह ने दिखाई थी। किन्तु जागीर के मन्त्र से इस तरह और इतनी जल्दी जादू की छड़ी फिर जाएगी, इसकी कल्पना बादशाह को न थी। अनेक दिनों के उपवास और फौजियों द्वारा की गयी पिटाई के कारण कविराज के शरीर की चमक जा चुकी थी। शरीर थका थका सा और सिर के बालों में जूएँ भर गयी थीं। इत्र के शौकीन कविराज के शरीर से खून और पसीने की बदबू आ रही थी। सम्भाजी :. 739