छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंबादशाह ने कलश को अपने सामने वाली गद्दी पर. बैठने का इशारा किया। किन्तु कलश खड़े ही रहे। औरंगजेब कुछ कड़ी आवाज में बोला, "क्यों कविराज कौन-सी जागीर चाहिए? आगरा, बरेली, लखनऊ या सासाराम? बोलो कौन- सी?" "सिर्फ एक फरियाद लेकर आया हूँ आपके दरबार में।" कविराज का स्वर दयनीय था। "कैसी? और कौन-सी फरियाद?" "शहंशाह! आप मेरे टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों के आगे डाल दें तो भी कोई बात नहीं। किन्तु मेरे राजा के साथ आप एक राजा जैसा ही बर्ताव करें।" कलश का कथन सुनकर बादशाह चकरा गया। उसने क्रोध से पूछा, "किसलिए आये हो? अपनी जान बचाने के लिए या सम्भा की?" "हम तुम्हारे आगे भीख नहीं माँग रहे हैं। तैमूर के महान वंश का दम भरने वाले बादशाह से हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं, 'बकरे काटने वाले कसाई और हिन्दुस्तान के सिंहासन पर बैठने वाले राजा के व्यवहार में कुछ तो फर्क होना चाहिए'।" कवि कलश के ऐसा बोलने से वहाँ उपस्थित सैनिक और सेवक थरथर काँपने लगे। बादशाह की गुस्से से घूमती आँखों को देखकर ऐसा लगा मानो माथे में घुसी जा रही हों। कलश की जबान की तलवार झपाझप चल रही थी। "कितनी घोर विडम्बना है। 'क्या जुलूस निकाला। अपने आसुरी आनन्द का ऐसा खुला प्रदर्शन, द्वेष का ऐसा नग्न दर्शन, दुष्ट बुद्धि का ऐसा नर्तन संसार के किसी भी सत्ताधीश ने कभी भी न किया होगा।" "काफिरों का सम्मान करने की हमारी यही रीति है। बेवकूफ!" "बादशाह को दुश्मनों से तो कुछ तहजीब और दिलदारी सीखनी चाहिए।" "किस तहजीब और दिलदारी का पाठ हमें पढ़ा रहा है तू, पागल शायर?" बादशाह पूरी तरह खिसिया गया था। "यह शायर थोड़ा-थोड़ा इतिहास भी जानता है। तुम्हारी और सुजा की जब निर्णायक लड़ाई चल रही थी, तब पंजाब में मिर्जाराजा जयसिंह तुम्हारे विरोध में लड़ रहे थे। उस समय लाख के जंगल में तुम्हारे ऊपर बहुत बुरा समय आया था। उस जंगल में तू जयसिंह को एकदम अकेला मिल गया था। ठीक वैसे जैसे सिंह के पंजे में किसी भेड़-बकरी का पैर आ जाए। उसी समय यदि बिना दया दिखाए उसने तुम्हारा गला चीर दिया होता तो औरंगजेब नाम का यह संकट आज के लिए बचा न रहता।" कलश की उस जानकारी से बादशाह बौखला गया। अपने को सँभालते हुए 740 :: सम्भाजी