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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सिपाहियों की ओर चिल्लाया, "बदमाशोऽऽ, पागलोऽऽ, क्या देख रहे हो? खींच लो इस बेशर्म शायर को। उसकी टाँगें तोड़कर हमेशा के लिए किसी गन्दी नाली में फेंक दो।" बादशाह के सिपाही जल्दी से कविराज को खींचकर ले जाने लगे। उस समय पीछे मुड़कर कलश दाँत पीसते हुए जोर-जोर से कहने लगे, "अल्लाह की सेवा सिर्फ टोपियाँ सीने का नाटक करने से नहीं होती। पागल बादशाह, तुम्हारे दिमाग के टाँके ही ढीले पड़ गये हैं।" "अरे देखते क्या हो कमबख्तो? ले जाओ घसीटकर इस मूर्ख शायर को।" बादशाह का हुक्म पाते ही सैनिक उस पर टूट पड़े किन्तु कलश उनकी पकड़ में नहीं आ रहे थे। वे जोर जोर से कविता गा रहे थे— 'पाप कर्म करके सदा करता बिस्मिलाह ढोंग किया, टोपी सिया मिले नहीं अल्लाह निज दिमाग को टाँक लो पागल शाहंशाह' कविता की इन आधी अधूरी पंक्तियों के कान में पड़ते ही बादशाह क्रोध से पागल हो उठा। वह अपनी कटार हाथ में लेकर गरजा, "क्या सुन रहे हो? पहले इस मगरूर शायर की जीभ काट दो। इसकी लाल चटचटाती जीभ काट दो।" सिपाही छुरी-कटारी लेकर कलश की ओर दौड़े। बलवान शरीर वाला एक पठान कलश की छाती पर बैठ गया। दूसरे दो लोगों ने पैरों को गन्ने की तरह मरोड़कर पीछे खींचा। दोनों ने अपने राक्षसी हाथों से कविराज की खोपड़ी पकड़ी। एक ने उनके मुँह पर जोर का तमाचा मारा, जबड़े में हाथ डाला। इस प्रक्रिया में कविराज के चार दाँत टूटकर नीचे गिर गये। वह जल्लाद कविराज की जोभ बाहर खींचने का प्रयास कर रहा था। कविराज की आँखें सफेद पड़ गयीं। साँस फूल रही थी। इसी बीच आगे खींची हुई कविराज की जीभ कटार से छाँट दी गयी। उनकी स्थिति आधी खोपड़ी टूटी चटपटाती मुर्गी की तरह हो गयी। कविराज के मुँह से शब्दों की जगह रक्त की धारा बह रही थी। घायल होने के कारण आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें तिलमिलाकर लम्बी हो रही थीं। सम्भाजी :: 741