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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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तेरह सुराही का पानी बादशाह ने गटागट पी लिया। उसकी थकी हारी देह में थोड़ी सजगता आयी। उसने अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा। भावुक होता हुआ वह उदयपुरी बेगम से बोला, “बेगम, तुम्हारे सामने एक बात कहकर मैं अपने दिल को हल्का करना चाहता हूँ।” “ऐसी कौन-सी बात है, मेरे आका?” “जी हाँ बेगम। मेरी अपेक्षा इस जहन्नुमी सम्भा का बाप कितनी बड़ी किस्मत वाला था जिसने सम्भा जैसे बहादुर बेटे को जन्म दिया। हमारे चार चार शहजादे लेकिन बस, गधों की भीड़। इस सम्भा जैसा एकाध होनहार बच्चा हमारे यहाँ जन्मा होता तो मैं अल्लाह से केवल दो ही चीजें माँगता—जपने की माला और नमाज की चादर। बस इन्हीं दो चीजों को लेकर मैं एक पाक फकीर की तरह हमेशा के लिए मक्का मदीना की यात्रा पर चला गया होता।” उदयपुरी ने बादशाह के जीवन के अनेक चढ़ाव उतार, यश अपयश को बहुत समीप से देखा था। किन्तु आजकल की बादशाह की मनोदशा उससे देखी नहीं जा रही थी। उदयपुरी को अपने पति पर दया आ रही थी। वे बोलीं, “मेरे आका हमारी इच्छा के अनुसार ही अल्लाह ने हमारा साथ दिया है। बीजापुर समाप्त हो गया, गोलकुंडा अपनी शरण में आ गया, शिवा का बेटा भी मिल गया। लेकिन इस विजय का आनन्द बादशाह के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर बात क्या है मेरे हजरत?” बादशाह ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। जाप की माला को छाती से लगाए बहुत देर तक कुरान की आयतों का मनन करता हुआ वह उसी तरह बैठा रहा। बादशाह के मन को बहलाने के उद्देश्य से ही उदयपुरी ने कहा, “हजरत आपकी जवानी की वह जंग आपके साथी तो क्या जानवर भी नहीं भूले होंगे। वह बलख के आक्रमण का घमासान युद्ध। दिन ढलने लगा था, हजरत के सायंकाल के नमाज का वक्त हो गया था। आप जंगे मैदान में ही चादर डालकर नमाज पढ़ रहे थे। उस समय आपकी दाहिनी और बाईं ओर तोप के गोले छूट रहे थे, बाणों की बौछारें उड़ रही थीं। उस जंगे मैदान में एक आपको छोड़कर इतना बेधड़क कोई नहीं था। उस लड़ाई में हाथियों, घोड़ा, ढालों की आड़ में तो हर कोई जंग लड़ रहा था किन्तु आप बिना विचलित हुए निश्चिन्त भाव से नमाज पढ़ रहे थे। आपको देखकर लोगों की आँखों में आँसू उमड़ आये। सारे फौजी कहते थे, 'वह देखो जिन्दा पीर' ऐसा कहते हुए जिल्लेसूबहानी की ओर उँगली उठाते थे।” 742 :• सम्भाजी

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