छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबादशाह के साथ वे दोनों राजबन्दी भी थे। उन पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार पहले की तरह ही हो रहा था। बादशाह सोचता था कि इन कैदियों की चीख-पुकार सुनकर शायद रायगढ़ पर महारानी का कलेजा फटे और वे अपने पति की जान बचाने के लिए तुलापुर की ओर दौड़ी चली आयें। यह कल्पना बादशाह को भी बहुत व्यग्र कर रही थी। 3 मार्च, 1689 को बादशाह की फौज कोरेगाँव के मैदान तक पहुँच गयी। तुलापुर के पीछे पहाड़ की तलहटी में भीमानदी के किनारे बादशाह का खेमा फैला हुआ था। एक ओर से बहती हुई आती सन्त तुकाराम की इन्द्रायणी और दूसरी ओर से सीमा। इन्हीं दो नदियों के संगम पर तुलापुर बसा हुआ था। दोनों नदियों के बीच एक छोटी पहाड़ी जैसा ऊँचा स्थल था। उसी पहाड़ी पर औरंगजेब ने अपना लालबारी डेरा खड़ा किया था। उसकी बची हुई तीन लाख सेना बडू कला और बडू खुर्द से लेकर कोरेगाँव तक डेरा डाले पसरी थी। लालबारी के डेरे-डंडे जिस दिन वहाँ लगे उसी दिन शाम को बादशाह ने मियाँखान को अकेले में बुलाया। मियाँखान के कान में औरंगजेब फुसफुसाया, "अपनी फौज के सबसे अधिक विश्वासपात्र के रूप में मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है, मियाँखान ?" "जहाँपनाह आपकी खातिर तो जान भी हाजिर है।" "हमें एक सन्देह हो रहा है। सन्देह नहीं विश्वास हो गया है कि हमारी छावनी के कुछ लोग खुफिया तौर पर अभी भी उस सम्भा के साथ मिले हुए हैं।" "क्या कह रहे हैं, मेरे आका?" मियाँखान के गले में जैसे कुछ अटक गया। "इसीलिए जानबूझकर मैंने तुम्हें बुलाया है। हमारा अब किसी पर भरोसा बचा नहीं है। कौन हैं ये मक्कार? आप ही इन्हें ढूँढ़ निकालिए।" "ठीक है, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा, मेरे आका।" मियाँखान ने सौगन्ध खाई। तुलापुर की छावनी में दिन बीतने लगे। जुल्फिकारखान की ओर से फतह की कोई सूचना नहीं आयी। मराठों की महारानी और उसकी सेना शरणागत होने का नाम नहीं ले रही थीं। बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उन दोनों राजबन्दियों को पकड़े पूरा महीना बीत गया था, फिर भी राजबन्दी जीवित थे। बादशाह ही नहीं, सभी सैनिकों की आँखों के सामने अतीत की क्रूर कथाएँ बार-बार साकार हो रही थीं। मथुरा में नेस्तनाबूद किये गये वे गोस्वामी, दारा शिकोह, भाई मतीदास, भाई सतीदास, दयालदास और गुरु तेगबहादुर...। सम्भा और कलश को मारने पीटने से भी कुछ हाथ नहीं लग रहा था। बादशाह को अनुभव हो रहा था कि छावनी के सारे अधिकारी ही नहीं, फौजी बाजारों के आवारा लड़के भी उसकी ओर 744 :: सम्भाजी