छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 748, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंमियाँखान बादशाह के सामने टालमटोल करने लगा। तभी बादशाह जल्लादों पर चिल्लाया, “मियाँखान ना कहता है तो सम्भा से पहले उसकी ही आँख निकाल लो।” मियाँखान का हाथ थर-थर काँपने लगा। उसने काँपते हाथों में जलती सलाइयों को पकड़ लिया। धीरे धीरे चार कदम रखता हुआ सम्भाजी राजा के पास पहुँच गया। सम्भाजी राजा की तेजस्वी आँखों के पास उन तपती सलाइयों को ले जाते-ले जाने अचानक उन्हें अपने पेट में चुभा दिया। जोर का शोर उठा। बादशाह के इशारे पर नौकर आगे दौड़े। उन्होंने मियाँखान के शरीर पर तलवार से सपासप वार किया। मियाँखान का रक्त मांस सम्भाजी राजा के पैरों में बिखर गया। बादशाह की आज्ञा से जल्लाद आगे बढ़े। तप्त लाल सलाइयाँ सम्भाजी राजा की आँखों में घुमाई गयीं। चर्र चर्र की आवाज हुई। आँखों से धुआँ उठा। चेहरे का चमड़ा भी थरथराया। किन्तु मुँह से भय या आक्रोश की कोई चीख नहीं उठी। यह देखकर औरंगजेब को बहुत दुःख हुआ। चौदह जिंजी के भव्य किले के नीचे कंसोपन्त त्रिमल का निवास था। दिन डूबते डूबते आज यह दुखद समाचार वहाँ पहुँच गया। 'शम्भूराजा कैद हो गये उन्हें औरंगजेब की सेना जंजीरों से बाँधकर ले गयी।' इस समाचार ने केसोपन्त का कलेजा टूक टूक कर दिया। केसोपन्त त्रिमल के भीतर का ईमानदार रक्त उन्हें शान्त बैठने नहीं दे रहा था। ऊपर किले पर हरजी राजा के पास भी यह समाचार पहुँचा था। केसो त्रिमल को विश्वास था कि समाचार पाते ही हरजी राजा उन्हें बुलाएँगे। इसीलिए उन्होंने तैयारी आरम्भ कर दी थी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का संकेत दिया। उन्होंने कहा, “किसी भी समय औरंगजेब से बदला लेने के लिए हमें महाराष्ट्र वापस जाना पड़ सकता है।” केसो त्रिमल के बड़े भाई मोरोपन्त शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में पेशवा थे। उन्होंने महाराज के साथ लेखनी ही नहीं तलवार भी चलाई थी। पिंगले घराने के वफादार खून की परम्परा को केसोपन्त ने रामशेज के किले पर भी प्रमाणित किया था। दो वर्षों तक किले पर आँच नहीं आने दी थी। एक विश्वासपात्र के रूप में ही सम्भाजी राजा ने उनकी नियुक्ति दक्षिण के तमिल और कर्नाटक प्रदेश में की थी। 746 • सम्भाजी