छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरही थीं। थोड़ी दूर जाकर बादशाह के पैर ठिठक गये। वह स्वयं से प्रश्न पूछने लगा, 'आखिर तुमने क्या निश्चित किया? अपने जन्मजात शत्रु को यों ही जिन्दा रखना है? काजी के फतवा जारी करने के बाद भी?' सत्रह वह अमावस्या के पहले की रात थी। भीमा नदी के किनारे सन्नाटा पसरा पड़ा था। अँधेरा घनीभूत हो गया था। नदी में बाढ़ का बहाव था और हवा तेजी से बह रही थी। तुलापुर की पहाड़ी की दूसरी ओर रह-रहकर सियारों का शोर उठता था। कहीं कोई कुत्ता गला फाड़कर रोने लगता था। कहीं कोई बेपरवाह टिटिहरी नदी की धारा पर टींऽऽ, टींऽऽ की कर्कश आवाज करती, इधर-उधर उड़ती थी। नदी के किनारे ही बाँस और घास से बना वह बन्दीखाना था। जैसे जानवरों को घेरकर रखा जाता है, उसी प्रकार सम्भाजी राजा और कवि कलश को रखा गया था। इन दोनों हतभाग्य प्राणियों को पिछले अड़तीस-चालीस दिनों से ठीक से नहाने को नहीं मिला था। मियाँखान और उसके कुछ साथी अभी भी बन्दीखाने के पहरे पर थे। ये लोग यथा सम्भव राजा की सेवा शुश्रूषा कर दिया करते थे। उन दोनों राजबन्दियों के शरीर पर बहुत खुजली उभरती थी दुर्गन्ध आती थी, ऐसी शिकायतें समय-समय पर की गयी थीं। इसी कारण बीच-बीच में पानी का बर्तन लेकर आते थे। जिस प्रकार बैलों या भैंसों पर पानी मारा जाता है उसी प्रकार कभी चार दिनों में इनके ऊपर पानी फेंक दिया जाता था। इन दिनों बार-बार की मार-पीट के कारण उनके शरीर में जगह-जगह पर छाले पड़ गये थे। सिर के बाल भी पहरेदारों ने अनेक बार खींचे थे। बालों की जड़ें टूटने से वहाँ अभी भी पीड़ा हो रही थी। इस प्रकार की यातनाएँ शरीर के अंग-प्रत्यंग को आग की तरह जला रही थीं। कविराज के तो जीभ ही नहीं थी। वे तो अपनी वेदना को व्यक्त भी नहीं कर सकते थे। मध्यरात्रि बीत गयी। नदी के पाट के बहाव पर हवा का एक आवर्त निर्मित हुआ। कुछ समय तक यह आवर्त वहीं पर घूमता रहा। देखते-देखते हवा का वह झोंका मानवी आकार में बदल गया। करुण और वेदनामय आवाज करता हुआ वह हवा का झोंका नदी की कछार चढ़कर ऊपर आया। देखते-देखते वह बन्दीखाने की दरार मे भीतर चला गया। 754 :. सम्भाजी